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मुर्गों के समाज में भ्रष्टाचार, अराजकता, अन्याय एवं कुव्यवस्था अपने चरम सिमा पर है किन्तु इसे उजागर करने के लिए समाज के सज्जन मुर्गों के पास समय नहीं है और समाज में जब भी कोई मुर्गा कटता है तो पिजड़े में बंद अन्य मुर्गें अपनी आखें बंद कर लेते है तथा कटने वाले मुर्गे को दुर्जन और अपने आप को सज्जन मुर्गा समझते है किन्तु जब उस सज्जन मुर्गे की बारी आता है तो वह सज्जन मुर्गा कुछ सोचे या समझे उससे पहले उसका गर्दन कट जाता है और पिजड़े में बंद बचें शेष मुर्गे अपने आप को सज्जन मुर्गा समझते है यह मुर्गों का सौभाग्य है क्योकि यह अपने चूजों को बंद पिजड़ा विरासत में देने वाले पहले सज्जन मुर्गे हैं।

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पिंजड़े में बंद मुर्गा भूखा नहीं मरता

स्पार्क न्यूज़, न्यू दिल्ली: मुर्गों का समाज अपने चूजों को बंद पिजड़ा विरासत में देने वाले पहले सज्जन मुर्गे हैं क्योकि पिजड़े में बंद मुर्गा कभी भी भूखा नहीं मरता है और जब देश 1947 में आजाद हुआ था तो आजादी तो सभी मुर्गों को बराबर मिल गई किन्तु दाना का बराबर बटवारा नहीं हुआ और जो मुर्गे पढ़ें लिखे थे सरकार उन्हें घर-घर जाकर नौकरी(दाना) दे रही थी किन्तु कुछ ऐसे भी मुर्गे थे जिन्होंने सरकारी नौकरी को लात मार दिया किन्तु आज बंद पिजड़े का महत्व सभी मुर्गों के समझ में आ गया है और अब सरकारी हो या प्राइवेट एक पिजड़ा सभी मुर्गे को चाहिए नहीं तो अपना दुकान खोलकर पिजड़े के मालिक का दाना बेचों या इनके पिजड़े की देख-भाल करों क्योकि पिजड़े के मालिक ने किसानों से सारा दाना खरीद कर अपने पास रख लिया है और उसका रूप बदलकर अपने नाम से दुकान में बेच रहा है और जो दाना ख़राब होने लगता है उसे सरकारी सेवा या योजना के नाम पर गरीब मुर्गों को फ्री में देकर पिजड़े का मालिक गरीब मुर्गों का मसीहा बना गया है।

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