कोरोना काल और मजदूर स्त्रियों की पीड़ा

किसी भी देश की रीढ़ की हड्डी उसका श्रमिक वर्ग (जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों शामिल) होता है,जिसको स्वस्थ और सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी उस देश की सरकार की होती है परंतु बदलते वक्त के साथ वही श्रमिक वर्ग अति दयनीय, लाचार और बेबस हो गया है। आर्थिक उदारीकरण और भूमंडलीकरण के इस दौर ने मजदूरों से सरकार और कानून का साथ छीनकर जिस चौराहे पर उसे लाकर खड़ा किया है, वहां वह पूरी तरह से लावारिस दिखाई देता है। पिछले 5 महीनों की इस वैश्विक महामारी ने भारत के मजदूर वर्ग को जिस बदहाली में पहुँचाया है, वह असहनीय और अकल्पनीय है। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि जिन मजदूरों के बूते बड़े-बड़े महल-मुनारे खड़े किये जाते हैं, दैनिक जीवन के सारे कार्य होते हैं,निर्माण में जिन मजदूरों का खून, पसीना और श्रम लगता है, इस महामारी के दौर में उन्हीं शहरों और लोगों ने मजदूरों को पनाह नहीं दी। दुखद यह है कि मजदूर स्त्री ने इस कोरोना काल में सबसे ज्यादा त्रासद और भयावह स्थितियों का सामना किया है।

मजदूरों का बहुत बड़ा हिस्सा स्त्रियाँ होती हैं जो समाज के पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर तबकों से आती हैं और समाज को बेहतर बनाने में अपना जीवन लगा देती हैं। देशभर में जहाँ भी हाड़तोड़ मेहनत का काम होता है, वहां मजदूर स्त्रियाँ पुरुषों के बराबर काम करती हैं। जिनके होने से मध्यवर्गीय प्रगतिशील और आत्मनिर्भर दिखने वाली स्त्रियाँ नये मुकाम हासिल करती हैं। उन्हीं मजदूर स्त्रियों ने इस महामारी में जितने कष्ट सहे हैं, उनको बयाँ करना मुश्किल है। आज भी उनके हृदयविदारक दृश्य याद आते हैं तो रौंगटे खड़े हो जाते हैं और आँखें नम हो जाती हैं। आपदा के समय इन मजदूर स्त्रियों से सभी ने पीछा छुड़ाने की कोशिशें की और उसका अंजाम यह हुआ कि वीरान सड़कों पर सामान के गट्ठर उठाये, अपने सीने पर दूधमुंहे बच्चों को चिपकाये तपती दोपहरी में भूखी-प्यासी कई-कई दिनों तक ये स्त्रियाँ बदहवास चलती रहीं लेकिन सरकार और सुविधाभोगी मध्यवर्ग उनके प्रति संवेदनहीन बना रहा। रिक्शा, ठेले खींचती, बैल बनी ये मजदूर स्त्रियाँ विस्थापित होकर अपने गाँवों को लौटने के लिए विवश हुई। जिन्होंने रास्तों में न केवल अपने परिजनों को खोया,बल्कि बहुत सारी स्त्रियों ने अपनी जानें भी गंवाई। मरी हुई स्त्रियों के आसपास बिलखते बच्चों के दृश्य आज भी विचलित करते हैं।

ऐसी महिलाएं भी देखने को मिली जो आठ महीने और चार महीने के गर्भ को लेकर हजारों किलोमीटर पैदल चलीं। सबसे शर्मनाक वाकया यह था कि एक महिला ने सड़क पर ही प्रसव पीड़ा को सहने के बाद 160 किलोमीटर की दूरी तय की। इसी दौरान केरल में एक गर्भवती हथिनी के मरने की दुर्घटना घटी, जिसपर सारा समाज व्याकुल दिखाई दिया लेकिन तीन महीनों तक चलती गर्भवती स्त्रियों ,रेंगते अपाहिजों और तालाबंदी में होते मजदूर स्त्रियों के साथ बलात्कारों पर वही सभ्य-संवेदनशील समाज मौन रहा। अपना गाँव, अपनी मिट्टी को छोड़कर एक बेहतर जिंदगी जीने की अभिलाषा से यह स्त्रियाँ अपने पुरुषों के साथ बार-बार पलायन करने को विवश होती हैं और अपना सर्वस्व देकर भी शहरों में बेगानगी और अजनबियत की जिंदगी जीती हैं। कोरोना की मार का अभी भी सबसे ज्यादा असर इन मजदूर स्त्रियों पर दिखाई दे रहा है जो घरों में बंद होने से पीड़ित हैं। वे दिनरात की मजदूरी करके अपने परिवारों का पेट पालती थीं। जितने कष्ट सहकर वे शहरों से गाँवों की ओर गयीं थी अब मजदूरी की तलाश में फिर से शहरों की ओर लौटने को अभिशप्त हो रही हैं। लॉकडाउन की परिस्थितियों ने सरकारों की सारी पोल खोलकर रख दी, जिसमें मजदूर स्त्रियों के हिस्से भूख, बेरोजगारी और पलायन के सिवा कुछ नहीं आया है।

स्त्री समाज का अभिन्न अंग है यह वाक्य आप रोज सुनते हैं परन्तु सबसे ज्यादा श्रमशील होकर भी मजदूर स्त्रियाँ अनगिनत मुश्किलों को झेलती हैं, उनकी अस्मिता रोज तार-तार होती है। उनका जीवन सामाजिक विसंगतियों और विडम्बनाओं से भरा हुआ है। कठोर परिश्रम के वाबजूद भी समाज में वे अपनी एक खास जगह नहीं बना पाती व उनकी जद्दोजहद का कोई अंत नजर नहीं आता। दुःख की बात यह है कि आज के स्त्री विमर्शों और साहित्य जो समाज का आईना है, में भी इस मेहनतकश औरत की उपस्थिति न के बराबर है। सरकारें भी मजदूर स्त्रियों को सुरक्षा देने में असफल रही हैं। मजदूर स्त्रियों के साथ हुए इस दुर्व्यवहार ने मार्क्स और एंगेल्स के इन शब्दों को चरितार्थ किया है कि ‘मजदूरों का कोई देश नहीं होता’ और कोरोना के रूप में आयी इस महामारी ने यह तस्वीर और स्पष्ट कर दी कि आज भी इस देश में मजदूरों का कोई नहीं है। कोरोना काल में मजदूर स्त्रियों के साथ घटी अनेक दर्दनाक घटनाओं ने यह सिद्ध किया कि उनके लिए यह काल अभिशाप बनकर आया है। सरकारों, विभिन्न संस्थाओं और तमाम वर्गों को मजदूरों के प्रति बहुत संवेदनशील होने की जरूरत है तभी देश का आर्थिक, सामाजिक ढांचा बच पायेगा।

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डॉ. आशा रानी

एसोसिएट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय
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