हार कर भी हीरो रहे तेजस्वी, यह रही कमियां

Story Highlights
  • तेजस्वी ने एकतरफा चुनाव को कड़ी टक्कर में बदल दिया
  • नीतीश सरकार के विरुद्ध 15 साल रही सरकार की एंटी इनकम्बेंसी थी
  • कोविड काल में दूर दराज के राज्यों से दर्दनाक तरीके से वापिस आए मज़दूरों में रोष था
  • पर कमज़ोर नेतृत्व के कारण कोई भी राजनैतिक विश्लेषक महागठबंधन को अहमियत नहीं दे रहा था।
  • अचानक से तेजस्वी का लीडर के तौर पर उदगम हुआ
  • बिहार की जातिवाद की राजनीति के उलट उन्होंने 10 लाख नौकरियों जैसे वादे सामने रखे
  • उनकी रैलियों में जुटी लाखों की भीड़ ने सभी को चौकाया
  • सभी एग्जिट पोल ने तेजस्वी के सीएम बनने की भविष्यवाणी की
  • टिकट बंटवारे को लेकर लोकल लीडरशिप में रोष था
  • हार का एक बड़ा कारण MY फेक्टर का दरकना रहा
  • कमज़ोर कांग्रेस को 70 सीटें दी गईं
  • नौकरियों की बात तो की पर रोज़गार पर कोई बात नहीं हुई
  • 10-11 सीटों पर बेहद काम वोटों से हारना भी कारण रहा
  • चुनाव सिर्फ शार्ट टर्म करिश्माई छवि से नहीं जीता जा सकता, संगठन पर 5 साल की मेहनत सबसे अहम है

आज हम चर्चा कर रहे हैं 31 साल के एक ऐसे नौजवान की जिसने मुकाबला करने की ठानी और फिर वो हुआ जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। उस नौजवान ने ना सिर्फ जमकर मुकाबला किया, बल्कि मुकाबले से बाहर मानी जा रही अपनी टीम को जीत के दहलीज़ तक पहुंचा दिया।

जी हाँ हम बात कर रहे हैं बिहार चुनाव की और उस चुनाव में सबसे ज़्यादा सुर्खियाँ बटोरने वाले तेजस्वी यादव की। हालाँकि महागठबंधन बिहार चुनाव में NDA से पिछड़ गया, पर चुनाव के हीरो तेजस्वी यादव ही रहे। उन्होंने अपनी करिश्माई छवि को करीने के साथ गढ़ा और एकतरफा बताए जा रहे चुनाव में अपनी टीम को टक्कर पर ला खड़ा किया।

2 महीने पहले तक सभी राजनैतिक विश्लेषक बिहार चुनाव को NDA के पक्ष में एकतरफा मान रहे थे। नीतीश सरकार की 15 साल की जबरदस्त एंटी इनकम्बेंसी, बिहार की जनता में बेरोज़गारी पर भारी गुस्से, कोविड काल में दूर दराज के राज्यों से दर्दनाक तरीके से वापिस आए मज़दूरों का रोष और इस रोष के पीछे बिहार में ही रोज़गार नहीं मिलने की टीस होने के बावजूद या फिर यूं कहें कि भारी गुस्सा होने के बावजूद विपक्ष के कमज़ोर नेतृत्व के कारण कोई भी राजनैतिक विश्लेषक महागठबंधन को अहमियत नहीं दे रहा था। फिर अचानक से तेजस्वी यादव का लीडर के तौर पर उदगम होता है, वो जनता की नब्ज को बहुत ही प्रभावी तरीके से छूते हैं और बिहार की बहुचर्चित जातिवाद की राजनीति के उलट से 10 लाख नौकरियों जैसे जनता के सरोकार से जुड़े वादे सामने रखते हैं। तेजस्वी के विकास की बात जनता के मन को छूती है। कांग्रेस और लेफ्ट पार्टीज़ के साथ गठजोड़ होने से जनता उनकी नेतृत्व क्षमता को मजबूत समझने लागती है और उनकी रैलियों में लाखों की भीड़ जुटने लगती है। यह भीड़ NDA को ही नहीं चुनावी विश्लेषकों को भी चौका रही थी, उन्हें दुबारा से सोचने पर मजबूर कर रही थी.

जैसे जैसे तेजस्वी की रैलियां बढ़ती हैं, चुनावों का रुख भी बदलने लगता है, एक तरफा दिखाई दे रहा चुनाव, कांटे की टक्कर में बदलने लगता है। और फिर सारे एग्जिट पोल तेजस्वी यादव को सीएम बनने की भविष्यवाणी कर डालते हैं। फिर अचानक ऐसा क्या होता है कि वोटों की गिनती के दिन जीत से शुरू हुई तेजस्वी की पारी हिचकौले खाते-खाते देर रात तक हार में तब्दील हो जाती है?

आइये अब इसपर चर्चा करते हैं कि उनसे कहाँ चूक हुई, क्या-क्या गलतियां हुई, कहाँ-कहाँ कमीं रह गई?

कांग्रेस और RJD में टिकट बंटवारे को लेकर कार्यकर्ताओं और लोकल लीडरशिप  बहुत ज़्यादा रोष था, जिसे मैनेज करने में दोनों ही पार्टियां नाकमयाब रही हैं, खासतौर पर कांग्रेस में यह रोष ज़्यदा नज़र आया, पर शीर्ष नेतृत्व ने इस और ध्यान नहीं दिया।

मुझे इसका एक बड़ा कारण लालू प्रसाद यादव के MY फेक्टर का दरकना लगता है। कहाँ तो यह होना था कि मुस्लिम-यादव गठजोड़ के साथ-साथ विकास के एजेंडे में बाकी जनता भी प्लस हो जाती और कहाँ यह हुआ कि सीमंचल के मुस्लिम वोटर्स ही कांग्रेस और राजद का हाथ छोड़कर MIM की पतंग की डोर थाम लेते हैं। एक लीडर के तौर पर इसे तेजस्वी की हार भी माना जाना जाना चाहिए कि वो या उनकी टीम सीमांचल की जनता की नब्ज पकड़ने में नाकाम रही और उसे इस वजह से कम से 10-12 सीटें अपनी झोली से गँवानी पड़ी।

तीसरा यह भी कारण रहा कि कांग्रेस को पहले से कहीं ज़्यादा यानी 70 सीटें चुनाव लड़ने के लिए दे दी गई, जबकि कमज़ोर राष्ट्रीय नेतृत्व वाली और बिहार में नेतृत्व विहीन कांग्रेस के अच्छा परफॉर्म करने के बारे में सोचना अपने आप में कमज़ोर राजनीतिक सोच की ओर इशारा करता है, फिर कांग्रेस तो बिहार में इतनी मजबूत हाल के सालों में कभी रही ही नहीं कि ज़्यादा सीटों के लिए नेगोशिएट कर सके, तो उसकी झोली में इतनी ज्यादा सीटें डालना आत्मघाती कदम रहने वाला ही था, सो रहा भी। अगर कांग्रेस 25 कम सीटों पर और राजद 25 ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़ती तो नतीजा कुछ और ही होना था।

चौथी बड़ी गलती यह भी कही जा सकती है कि तेजस्वी ने सिर्फ नौकरियों की बात की, रोज़गार पर कोई रोडमेप, नीति या वादा सामने नहीं रखा। केवल 10 लाख नौकरियां देने के वादे भर से यह तो हो सकता था कि नौजवान समर्थन में आ जाएं, जो कि हुआ भी, पर रोज़गार के लिए दूसरे प्रदेशों में भटकने वाले श्रमिकों एवं उनके परिवार को अपनी तरफ करने में नाकामयाब रहे तेजस्वी यादव।

पांचवा और एक अहम कारण 10-11  सीटों पर बेहद काम वोटों से हारना रहा, हालाँकि इनमें से कुछ सीटों पर RJD ने इलेक्शन कमीशन के ऑफिसर पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए ऑफिशियल कंप्लेंट भी दर्ज की है, पर कांटे की टक्कर वाली इन सीटों पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाना चाहिए था, अलग से रणनीति अपनाई जानी चाहिए थी.

हिल्सा सीट पर तो हार-जीत का अंतर सिर्फ 12 वोट ही रहा, जहाँ आरजेडी के भोला यादव हुआ जहां बीजेपी के रामचंद्र प्रसाद से सिर्फ 12 वोट से पीछे रह गए. इसी तरह महागठबंधन को बरबीघा सीट पर 113 वोट, भोरे सीट पर 462 वोट, चकाई सीट पर 581 वोट, वछवारा सीट पर 484 वोट, परबत्ता सीट पर 951 वोट से हार मिली, कुछ सीटों में हार-जीत  का अंतर एक हज़ार वोट से कुछ ज़्यादा रहा. कांटे के मुकाबले वाली इन विधासभा सीटों पर अलग से रणनीति बनाए जाने की आवश्यकता थी.

और अंत में सबसे ज़्यादा अहम बात यह है कि कोई भी चुनाव सिर्फ शार्ट टर्म की करिश्माई छवि गढ़ कर नहीं जीता जा सकता है, जो तैयारियां या फिर क्षेत्रवार संगठन और रणनीतियां पिछले 5 साल और खासतौर आखिर के 2 सालों में ज़मीन पर उतारी जानी चाहिए थीं वो नदारद थीं। हर संभावित खतरे के उभरने पर प्लान बी या सी का अभाव ही तेजस्वी यादव के तेज को निखारने से पहले ग्रहण की ओर ले गया।

हालाँकि उन्होंने अपने मेकओवर से बेहतरीन कमबैक किया है, पर अगर आगे नई राह पर चलना है और बिहार की राजनीति को नई दिशा दिखानी है, तो जनता से जुड़े उनके वादों और उससे भी आगे बढ़कर जनता की ज़रूरतों पर सरकार के विरुद्ध लगातार संघर्ष करना होगा और सही मौके का इंतजार करना होगा।

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Shahnawz 'Sahil'

पत्रकारिता से करियर शुरुआत की, विज्ञापन एवं डिज़ाइन के क्षेत्र में कार्यरत तथा ग़ालिब के शहर दिल्ली में रहता हूँ...

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