कहानी: बानवे के बाद

बानवे के बाद तिरानवे नहीं आता। भले ही हमने जो गिनती सीखी है या हमारी कहानी के नायक मिर्जा साहब, अपने स्कूल में बच्चों को जो गिनती सिखाते हैं, उनमें आता हो। मगर यह कहानी है और कहानी में यह जरूरी नहीं। कतई जरूरी नहीं कि बानवे के बाद तिरानवे ही आए। अब देखिए ना हमारी इस कहानी में बानवे के बाद सीधे दो हजार दो आता है। यानी अयोध्या के बाद सीधे गुजरात आता है। बहरहाल उससे थोड़ा पहले यानी…

 

बहत्तर के बाद

बड़ा अजीब था उस गाँव का नाम। ‘टेमनीहाँई’।

मिर्जा साहब की शिक्षक के पद पर पहली नियुक्ति इसी गाँव में हुई थी। उन्होंने तब पहली बार इस गाँव का नाम सुना था। और वे सुनकर बड़ी देर तक हँसते रहे थे। उनके अब्बु और घर के दूसरे भाइयों और अपनी भाभियों को भी वे हँस-हँसकर उस गाँव का नाम बता रहे थे। दरअस्ल स्थानीय बोली में ‘टेम-नी-हाँई’ का अर्थ होता है, ‘समय नहीं है’ यानी मेरे पास समय नहीं है। यह तो मिर्जा साहब को उस गाँव में नौकरी करने के बाद भी नहीं मालूम हो सकता कि उस गाँव का नाम टेमनीहाँई क्यों, कैसे और कब पड़ा ?

लेकिन मिर्जा साहब ने यहाँ नौकरी करने के कुछ ही दिन में जाना कि अपने नाम के अनुरूप इस गाँव के लोगों के पास सचमुच समय नहीं होता था। गाँव के लोग मेहनती थे और अपनी खेतीबाड़ी के कामकाज और पशुपालन के साथ दूध के धंधे में व्यस्त रहते थे। हाँ, लेकिन जब एक दूसरे की मदद की बात आती तो सबके पास समय होता था। चाहे खुशी का कोई मौका हो या चाहे गम की कोई घड़ी, तब पूरा गाँव एक होता था। किसी की सहायता के लिए सब साथ मिलकर आगे आते थे।

मिर्जा साहब को इस गाँव की फिज़ा बहुत भाई। इतनी भाई कि उन्होंने इस गाँव में ही बसने का अपना मन बना लिया। उस समय उनके सामने सबसे बड़ी समस्या थी, अपने अब्बु को मनाना।

मिर्जा साहब जब नौकरी पर लगे थे तब, उनके चारों बड़े भाइयों का निकाह होकर सभी अपने-अपने काम-धंधों से लगे हुए थे। सभी भाई अपनी-अपनी गृहस्थी में खुश थे। खुद मिर्जा साहब की सगाई भी हो चुकी थी। अपने बड़े मामू की छोटी बेटी निकहत से उनका ब्याह रमजान से पहले की तारीखों में तय था। इस तरह मिर्जा साहब पर उस समय जिम्मेदारी के नाम पर सिर्फ अपने अब्बु और अपनी छोटी बहन आयशा की जिम्मेदारी थी। मिर्जा साहब की अम्मी का इंतकाल मिर्जा साहब के बचपने में ही हो गया था। मिर्जा साहब को तो अपनी अम्मी की सही शक्लों-सूरत भी याद नहीं थी। लेकिन मिर्जा साहब के अब्बु ने अपने बच्चों को बड़े लाड़ और जिम्मेदारी से पाला और सम्भाला था। अपने बच्चों को सौतेली माँ के साये से बचाने के लिए उन्होंने फिर ब्याह नहीं किया था। जबकि सभी नजदीकी रिश्‍तेदार हर दूसरे तीसरे दिन उन्हें कोई नया रिश्‍ता सुझाते रहते थे। मिर्जा साहब के अब्बु ने अपने सभी बच्चों को जहाँ तक और जैसी शिक्षा वे दे सकते थे, दिलाई थी और उनके ब्याह-शादी निपटाए थे।

मिर्जा साहब ने जब अपने अब्बु को बताया कि, निकाह के बाद वे उस गाँव में रहना चाहते हैं तो, उनके अब्बु बड़े खफा हुए थे और दुःखी भी।

  • ‘‘क्या करेंगे हम उस गाँव में रहकर, जहाँ हमारे लोग नहीं। जहाँ हमारा कोई रिश्‍तेदार नहीं। अरे, जुम्मे की नमाज के लिए कोई मस्जिद भी आसपास नहीं है वहाँ।’’ अब्बु गम और गुस्से से बड़बड़ाए थे।
  • ‘‘सब धीरे धीरे हो जाएगा अब्बु। आपको भी वह गाँव बहुत अच्छा लगेगा। वहाँ के लोग अच्छे हैं। एक दूसरे के मददगार है। और फिर यहाँ भी तो हमें घर छोटा पड़ता है।’’ मिर्जा साहब ने अपने अब्बु को समझाने की कोशिश की थी।
  • ‘‘इस बुढ़ापे में अब नई जगह पर मन नहीं लगेगा अब्दुल! तेरा मन करता है तो तू वहाँ भले रह ले। लेकिन मैं अब यहाँ से नहीं जाऊँगा।’’ मिर्जा साहब के अब्बु ने जैसे अपना फैसला सुनाया था। लेकिन मिर्जा साहब भी जिद के पक्के थे और अपने अब्बु को छोड़कर भी नहीं जाने वाले थे।
  • ‘‘चलो कुछ दिन रहकर देख लेंगे वहाँ। अगर फिर भी आपका दिल न लगे तो बता दीजिएगा। हम सब वापस यहीं आ जाएँगे।’’ मिर्जा साहब ने शर्त के साथ अपने अब्बु के सामने विकल्प सुझाया। मिर्जा साहब के अब्बु, तब अपने बेटे का तर्क पसंद न आने के बावजूद थोड़ी ना-नुकूर के बाद मान गए थे।

उस गाँव में था ही कुछ ऐसा आकर्षण कि जो भी आता, वह फिर वहाँ से जाने का नाम नहीं लेता था। मिर्जा साहब अपने निकाह के बाद अपनी नई नवेली दूल्हन निकहत बेगम के साथ अपने अब्बु और छोटी बहन आयशा को लेकर इसी गाँव में आ गए थे।

मिर्जा साहब के गाँव में बसने की इच्छा जानकर सुखदेव चाचा ने अपना बड़ा-सा खला (खलिहान) बहुत सस्ते दाम पर मिर्जा साहब को दे दिया था। सुखदेव चाचा के बच्चे तब मिर्जा साहब की स्कूल में ही पढ़ते थे। और पढ़ने में कमजोर होने के कारण मिर्जा साहब स्कूल के बाद एक घण्टा अतिरिक्त रुककर कुछ दूसरे बच्चों के साथ उनके बच्चों को भी पढ़ाते थे। मिर्जा साहब की मेहनत कुछ ही दिनों में रंग लाई थी। सुखदेव चाचा के बच्चे तब स्कूल के छः माही इम्तेहान में अव्वल दर्जे पर आए थे। अपने बच्चों की शिक्षा के स्तर में आए इस अविश्‍वसनीय परिवर्तन पर सुखदेव चाचा भाव-विभोर हो गए थे ओर मिर्जा साहब के पैरों में लोट गए थे।

और जब बाद में उन्हें मिर्जा साहब के गाँव में ही रहने की इच्छा का पता चला था तो वे दौड़े-दौड़े मिर्जा साहब के पास गए थे और गुरुदक्षिणा में अपना खला मिर्जा साहब को दे दिया था। मगर मिर्जा साहब इतनी बड़ी गुरुदक्षिणा नहीं ले सकते थे। उन्होंने मुफ्त में खला लेने से इंकार कर दिया था, तब सुखदेव चाचा ने औने-पौने दाम बताकर मिर्जा साहब को वह खला दे दिया था।

पूरा गाँव खुश था कि मिर्जा साहब अब उन्हीं के गाँव में रहेंगे। ईंट, गारा, मिट्टी, पत्थर और घर की छत और खम्बों में लगने वाली लकडि़याँ जैसी चीजों का इंतजाम गाँव वालों ने इधर-उधर से कर लिया था। और देखते ही देखते उस खले में मिर्जा साहब का घर तैयार हो गया था।

मिर्जा साहब के गाँव में ही बसने से सचमुच क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। स्कूल के कमजोर बच्चों को मिर्जा साहब अपने घर पर शाम को अलग से पढ़ने के लिए अब ज्यादा समय दे पाते थे। गाँव वालों के लिए चिट्ठी, पत्री, तार की समस्या आसान हो गई थी। लिखा-पढ़ी के कईं काम मिर्जा साहब कर दिया करते थे। और सबसे बड़ा चमत्कार तो यह हुआ कि मिर्जा साहब के अब्बु को यह गाँव बहुत भाने लगा था। दिनभर उनके पास गाँव के बुढ़े आकर गप्प हाँकते रहते। दुनिया-जहान की बातें करते रहते थे। धीरे धीरे मिर्जा साहब के अब्बु ने चबूतरे पर जाना भी शुरू कर दिया था। चबूतरे के बारे में मशहूर था कि तम्बाखू खाने की लत एक बार छूट जाए मगर चबूतरे पर बैठने की लत नहीं छूटती है।

चबूतरे पर दिन भर हँसी-ठिठोली के साथ दीन-दुनिया की गंभीर और जरूरी बातें भी होती थीं। बड़े से बड़ी समस्या इस चबूतरे पर हल होती थी, तो गाँव की छोटी से छोटी खुशी का यह चबूतरा गवाह बनता था। यह चबूतरा गाँव का केन्द्र था। गाँव की संचालक शक्ति था।

मिर्जा साहब का गाँव में नया नया घर बना तो बाकी चीजों के लिए भी उन्हें कहीं दौड़-धूप नहीं करनी पड़ी थी। खेतीबाड़ी वाला गाँव था। सब्जी-पाले की कहीं कोई कमी नहीं थी। दूध-छाछ भी भरपूर था।

मिर्जा साहब जितने समर्पण से गाँव के बच्चों को पढ़ा रहे थे। गाँव वाले उनसे अधिक समर्पण से मिर्जा साहब को सम्मान देते। रामदीन काका रोज सुबह का दूध मिर्जा साहब के घर पहुँचा देते थे। और हफ्ते में जब भी उनके यहाँ दही जमाया जाता, मिर्जा साब के यहाँ एक तपेली भरके सबसे पहले पहुँच जाता था। छाछ तो मिर्जा साहब के घर में हर दूसरे दिन किसी न किसी के यहाँ से आ ही जाती थी। बलदेव ठाकुर अपने खेतों में सब तरह की सब्जियाँ उगाते थे। वे लगभग हर दूसरे तीसरे दिन दो तीन तरह की सब्जियाँ मिर्जा साहब के घर याद करके भिजवा देते थे।

गेहूँ, जवार, मक्का, मूँग, चना, चवले जैसी दालों और दूसरे अनाज अपनी अपनी इच्छा और हैसियत से गाँव के लोग जिस तरह मंदिर के पुजारी शर्माजी के यहाँ पहुँचाते थे, उसी तरह गाँव के लगभग सभी घर से उतना ही मिर्जा साहब के घर भी पहुँच जाता था। शुरू शुरू में मिर्जा साहब को इतना कुछ मिलने या लेने पर संकोच होता था लेकिन धीरे धीरे उन्होंने जाना कि यह तो गाँव की परम्परा है, उसकी प्रकृति है कि जिसके घर जो नहीं होता, उस घर में वह सामान पहुँचा दिया जाता है।

मिर्जा साहब के अब्बु अब पहले से ज्यादा खुश और स्वस्थ हो गए थे। उन्हें अपने बेटे का निर्णय उचित लगा था। मिर्जा साहब के घर में लगभग सभी चीजें आवश्‍यकता से अधिक मात्रा में गाँव वालों के यहाँ से आ जाती थीं। इस तरह उनकी पगार लगभग पूरी बच जाती थी, सिर्फ पहनने-ओढ़ने का कभी-कभार का थोड़ा खर्चा था।

आयशा का ब्याह भी उन्होंने अपने इसी गाँव वाले घर से किया था। मिर्जा साहब के सभी भाई मिर्जा साहब के गाँव में ठाठ और सम्मान देखकर बहुत खुश हुए थे।

टेमनीहाँई उन दिनों एक अच्छी खासी आबादी का गाँव था। और स्कूल में बच्चों की संख्या के हिसाब से स्कूल में शिक्षकों का भारी अकाल था। प्राथमिक शिक्षा के लगभग डेढ़-पौने दो सौ बच्चों पर मिर्जा साहब को मिलाकर तीन शिक्षक थे और कुल पाँच कक्षाएँ थीं। पहली से पाँचवीं तक।

मीडिल स्कूल का तो और भी बुरा हाल था। सौ के आसपास बच्चों पर सिर्फ एक मास्टर था। इसलिए मीडिल कक्षाओं तक आते आते बहुत से बच्चे स्कूल से दाखिला निकाल लेते थे। मिर्जा साहब ने समस्या की जड़ खोज ली थी इसलिए सबसे पहले तो उन्होंने अपने विभाग में दौड़-धूप करके मीडिल स्कूल के लिए दो अतिरिक्त शिक्षकों की अपनी माँग आखिर मनवा ली थी। हालाँकि मिर्जा साहब की माँग मीडिल स्कूल के लिए चार अतिरिक्त शिक्षक और प्राथमिक स्कूल के लिए पाँच अतिरिक्त शिक्षकों की थीं।

मिर्जा साहब के पिता की तरह, मिर्जा साहब की नई नवेली दूल्हन निकहत बेगम भी शुरू शुरू में मन ही मन आशंकित और असमंजस में थी। आखिर उन्हें एक ऐसे गाँव में रहना था, जहाँ उनकी जात-बिरादरी का कोई नहीं था। लेकिन चार दिन रहकर ही उन्होंने जान लिया कि यह गाँव उनसे आसानी से छूटने वाला नहीं। मिर्जा साहब जब स्कूल चले जाते तो उनके अब्बु या तो घर के बाहर अपने ओटले पर या किसी और के ओटले पर बैठे बतियाते रहते थे। ज्यादा होता तो वे चबूतरे तक चले जाते थे। घर में नई दूल्हन निकहत बेगम और आयशा होती थीं लेकिन यह गाँव टेमनीहाँई उन दोनों को कभी अकेले नहीं छोड़ता था। आसपड़ोस से निकहत बेगम की हम-उम्र बहुएँ दोपहर के खाली वक्त में उनके घर आ जाती थीं और दुनियाभर की बातों में वक्त मालूम ही नहीं पड़ता था। बिनने-छानने के छोटे बड़े काम सब मिलकर वहीं निपट जाया करते थे। आयशा को भी यहाँ ऐसी सहेलियाँ मिली, जिन्हें वह ताउम्र नहीं भूल पाई। निकहत बेगम जब पहली बार पेट से हुई तब आयशा का निकाह हो चुका था। रामदीन काका की पत्नी सुगना काकी और सुखदेव चाचा की पत्नी मंगी चाची ने उनके घर के छोटे-बड़े सारे काम अपने हाथ में ले लिए थे लेकिन निकहत बेगम को इसमें संकोच होता था इसलिए उन्होंने अपने मायके से अपनी छोटी बहन हिना को काम करने के लिए बुलवा लिया था। मगर घर में काम ही कितना था! कुल जमा तीन लोग तो थे और हिना के आ जाने से चार हो गए थे। हिना बिना किसी हायलाय के भी उन्हें फटाफट निपटा देती थी। आयशा की सहेलियाँ अब हिना की सहेलियाँ हो गई थी। सिवा मंगत काका की बेटी किरण के जिसका ब्याह आयशा के ब्याह के कुछ ही दिनों बाद हो गया था। हिना का भी धीरे-धीरे गाँव में दिल लग गया था। निकहत बेगम की तरह हिना को भी पहली बार अपने मजहब से बाहर की संगत मिली थी। लेकिन उन्हें कहीं भी, और कभी भी कुछ भी अटपटा नहीं लगा था।

गाँव के तीज, त्यौहार गाँव में बड़ी श्रद्धा और विश्‍वास के साथ मिलकर मनाए जाते थे। खासकर गणगौर पर्व। गणगौर पर्व गाँव की आस्था का महापर्व था। इस पर्व के तीनों दिन हतई चौराहे से लेकर राम मंदिर प्रांगण तक अपूर्व उत्साह देखने को मिलता था। राम मंदिर हतई चौराहे से ज्यादा दूरी पर नहीं था। यूँ समझ लो कि हतई चौराहे से लगा हुआ था। जब गणगौर की धूम मची रहती, तब जैसे चौराहा छोटा पड़ जाता था। चौराहे से राम मंदिर प्रांगण तक एक बड़ी भीड़ नजर आती थी।

गणेश उत्सव, नवरात्रि, दशहरा, दीपावली, होली के त्यौहार भी धूमधाम से मनाए जाते थे लेकिन जैसा उत्साह गणगौर पर्व के तीन दिनों का होता था, वैसा बाकी त्यौहारों के अवसर पर दुर्लभ होता था।

मिर्जा साहब का परिवार गाँव में आ जाने से गाँव में अब धीरे धीरे एक नए त्यौहार की शुरूआत होने लगी थी। वह था मुहर्रम का। मिर्जा साहब रमजान के अंत में ईद के लिए अपने परिवार सहित अपने पुराने पैतृक घर चले जाते थे। और बकरीद पर भी। लेकिन मुहर्रम का ताजिया वे हर साल अपने आँगन में ही बनाते थे। मुहर्रम के बारे में या दूसरे मुसलमानी त्यौहारों के बारे में गाँव के लोग बहुत कम जानते थे। और बाद में भी सिर्फ इतना ही समझ पाए कि मुहर्रम के ताजिए से मन्नत माँगी जाती है और उसके नीचे से निकलना बहुत शुभ होता है। गाँव भर के लोग पूरी श्रद्धा के साथ उस ताजिए से मन्नतें माँगते थे।

और दूसरा त्यौहार ईद था। ईद के बारे में भी गाँव वाले कुछ ज्यादा नहीं जानते थे लेकिन जब रमजान के बाद मिर्जा साहब का परिवार लौटता था तो गाँव के अपने परिचितों और मित्रों को मिर्जा साहब अपने घर बुलाकर मीठी सेवइयाँ खिलाते थे। मिर्जा साहब के अब्बु अपने हम-उम्र बुजुर्गों को अलग से बुलाते थे और निकहत बेगम अपनी पहचान की औरतों को अलग से सेवइयों की दावत के लिए बुलाती थी।

गाँव के लोग भले ही ईद के बारे में ज्यादा न जानते हो लेकिन उन्हें मिर्जा साहब के घर की सेवइयाँ बहुत अच्छी लगती थी। निकहत बेगम सूखे मेवे में सजाकर जब परोसती थीं तो खाने से पहले ही खाने वाले की लार लपकने लगती थी।

मिर्जा साहब के परिवार के गाँव में बसने से पहले गाँव के बहुत से लोगों को यह भ्रम था कि मुसलमान तो सिर्फ गोश्‍त-माण्डे ही खाते हैं। मुर्गें और बकरियों का गोश्‍त ही नहीं, गाय तक का गोश्‍त खाते हैं लेकिन मिर्जा साहब के परिवार के गाँव में बसने से सभी का यह भ्रम दूर हो गया था। मिर्जा साहब के परिवार का खान-पान भी उन्हीं की तरह दाल-रोटी-सब्जी था।

मिर्जा साहब का परिवार गाँव में कुछ इस तरह हिल मिल गया था कि वह इस गाँव का जरूरी हिस्सा बन गया था।

 

बयासी के बाद

मिर्जा साहब के अब्बु ने खाट पकड़ ली थी। खाँसी के दौर जब उन्हें पड़ते तो घण्टे-घण्टे भर उन्हें चैन नहीं पड़ता था। गाँव की आबादी के लिहाज से तब एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र गाँव में खुल गया था। और गाँव में एक बंगाली डॉक्टर भी आ गया था लेकिन किसी का कोई इलाज मिर्जा साहब के अब्बु की खाँसी नहीं बैठा पाया और एक दिन खासी के ऐसे ही दौरे में वे चल बसे।

मिर्जा साहब के अब्बु के निधन पर पूरा गाँव दुःखी था। सारे लोग शोक मना रहे थे। किसी के घर का चूल्हा उस दिन नहीं जला था।

यह जानकर कि मिर्जा साहब के अब्बु को दफनाने के लिए कब्रगाह की जरूरत होगी। गाँव के मुखिया बलदेव ठाकुर ने आनन-फानन में गाँव की काकड़ से लगी बयड़ी के आसपास की जगह कब्रस्तान के लिए मुकर्रर कर दी थी।

अपने अब्बु के निधन पर गाँव वालों की यह मुहोब्बत और साथ देखकर मिर्जा साहब के भीतर गाँव के प्रति आदर और बढ़ गया था। वे अपने अब्बु के जनाजे को काँधा देते हुए, जनाने में लेटे अपने अब्बु से मन ही मन बोले थे, ‘देखो, अब्बु, ये गाँव वाले तुम्हें कितनी मुहब्बत करते हैं।’

यह गाँव में पहली मुसलमान मौत थी और गाँव रोया था। मिर्जा साहब के गम में उनके साथ शरीक था। मिर्जा साहब के अब्बु के जाने से हतई का चबूतरा कईं दिनों तक उदास रहा था और उन्हें याद करता रहा था।

मिर्जा साहब के अब्बु के निधन पर मिर्जा साहब के सुसराल वाले यह देखकर सुखद अचरज में थे कि मिर्जा साहब की पूरे गाँव में जबरजस्त पकड़ थी और रुतबा था। मिर्जा साहब के मामु जो कि उनके सुसर भी थे, ने मिर्जा साहब से कहा कि अगर उनका बेटा करीम भी इसी गाँव में अपनी सायकल के पंचर जोड़ने की दुकान डाल ले तो उसे रोजगार मिल जाएगा और उसे तुम्हारा सहारा भी रहेगा। मिर्जा साहब को कोई आपत्ति नहीं थी। उनका साला अगर गाँव में अपना धंधा डालता है और उससे वह अपने पैरों पर खड़ा होने लायक होता है तो इससे बढ़कर खुशी की बात और क्या होगी ? वैसे भी गाँव में तब तक सायकल पंचर की दुकान नहीं थी। लोग चार किमी दूर मुख्य सड़क से लगे दूसरे गाँव में पंचर सुधरवाने जाते थे। यही देखकर मिर्जा साहब के सुसर को यह विचार आया था।

करीम भी गाँव की मिट्टी में रम गया। उसने अपनी छोटी-सी गुमठी गाँव की मुख्य सड़क के किनारे लगा रखी थी, जहाँ सुबह शाम आने-जाने वाली एक मात्र बस रुकती थी। और अपनी रोजी-रोटी जितना वह कमाने लगा था। करीम धंधे से लगा तो झट उसके निकाह की बात चली और लगे हाथों उसके चाचा की लड़की से उसका निकाह हो गया। मिर्जा साहब ने करीम के निकाह होते ही उसे अपने बड़े से खले में एक छोटी-सी जगह दे दी थी, जहाँ उसने अपना टप्पर बना लिया।

मिर्जा साहब ने अब गाँव में थोड़ी बहुत खेती-बाड़ी की जमीन खरीद ली थी। और अपने खेतों को सुखदेव चाचा को साझे  पर दे रेखा था।

समय के साथ मिर्जा साहब का परिवार बढ़ गया था। मिर्जा साहब के पाँच बच्चे हो गए थे। पहली बड़ी लड़की जेबा। फिर दो लड़के आतिफ और असलम। और दो छोटी लड़कियाँ, जरीना और जिया।

पाँचों बच्चे मिर्जा साहब की स्कूल में ही पढ़ते थे और गाँव के माहौल में पूरी तरह घूल-मिल गए थे। जेबा और असलम पढ़ने में होशियार थे तो आतिफ और जरीना खेलने-कूदने में। सबसे छोटी जिया बहुत संजीदा बच्ची थी और अभी अभी स्कूल जाना शुरू किया था हालाँकि स्कूल नियमों के मुताबिक उसकी उम्र अभी स्कूल में भर्ती कराने लायक नहीं थी, यानी पाँच से थोड़ी कम थी।

मिर्जा साहब के बच्चे चूँकि शुरू से ही गाँव में रहे इसलिए कभी उनके मन में अपने अलग धर्म के होने को लेकर दुराव या दुराग्रह नहीं आया और न ही गाँव के दूसरे बच्चों के मन में ऐसा कुछ रहा था।

गाँव में तब तक कोई मस्जिद नहीं बनी थी लेकिन उसके निर्माण के लिए जगह तय हो गई थी। मिर्जा साहब ने जब गाँव वालों से मस्जिद निर्माण के लिए थोड़ी-सी जगह की माँग की तो गाँव वालों ने एक बैठक का आयोजन किया और उस बैठक में यह सर्वानुमति से प्रस्ताव पारित हुआ कि अगले दो साल तक चंदा इकट्ठा किया जाएगा। फिर मस्जिद निर्माण का काम शुरू कर दिया जाएगा। हालाँकि गाँव वालों में से कुछ ने इधर-उधर दूसरे शहरों में मस्जिद को बाहर से देखा था लेकिन उनमें से कोई नहीं जानता था कि मस्जिद के अन्दर खुदा होता कैसा है ? सभी उसे देखने के लिए मन ही मन उतावले थे। राजेश कारीगर ने उस बैठक में घोषणा की कि वह आधी मजदूरी पर पूरा निर्माण कार्य कर देगा। हीरालाल प्रजापत और सुन्दरलाल प्रजापत जो कि जाति के कुम्हार थे और मिट्टी के मटकों और ईंट का निर्माण करते थे, उन दोनों ने अपनी अपनी तरफ से आधी-आधी ईंटे देने की बात कही थी।

मस्जिद निर्माण के लिए गाँव की पंचायत ने अपने हिस्से की थोड़ी जमीन जो कि राम मंदिर से थोड़ी आगे करके ही थी, मस्जिद निर्माण के लिए तय कर दी थी। मिर्जा साहब खुश थे कि उनकी इबादतगाह के लिए उनका पूरा गाँव उनकी मदद को हाजिर था। शीघ्र ही उनके गाँव में उनकी मस्जिद बन जानी थी।

मिर्जा साहब और करीम हर महीने थोड़ा-थोड़ा अपने खर्चे से बचाकर मस्जिद के लिए इकट्ठा करने लगे थे। और इसके लिए उन्होंने एक गुल्लम में अलग से पैसे डालना शुरू कर दिया था। यह अजीब किन्तु सत्य था कि गाँव वालों ने एक अलग से दान-पेटी तब राम मंदिर प्रांगण में मस्जिद निर्माण के लिए रखवा दी थी।

आतिफ और असलम जिस शिद्दत और श्रम के साथ मुहर्रम के ताजिए बनाते थे, उतनी या उससे भी ज्यादा दौड़-धूप वे गणेश उत्सव की झाँकी में करते थे। नवरात्रि के पाण्डाल सजाने में करते थे। गणेश उत्सव की झाँकियों में आतिफ कभी अभिमन्यु बनता तो कभी लव या कुश और कभी कार्तिकेय। चूँकि असलम थोड़े भरे शरीर का था तो वह कभी बालक भीम बनता तो कभी किसी दैत्य का मुखौटा पहन लेता था।

जेबा पूरे साल नवरात्रि उत्सव के लौटने का इंतजार करती थी। नवरात्रि पर वह खूब सज-धजकर पाण्डाल में गरबे करती थी। और अपनी हम-उम्र सहेलियों के साथ त्यौहार के दिनों का लुत्फ उठाती थी। नवरात्रि का इंतजार सिर्फ जेबा को ही नहीं, जरीना और जिया को भी होता था। जब नवदिनों तक गाँव में अलग-अलग घरों से उन्हें बुला बुलाकर कन्याभोज के लिए ले जाया जाता था। उन कन्याओं के साथ उनका भी पूजन किया जाता था और प्रसादी दी जाती थी। नव दिनों तक गाँव के कईं घरों में खीर-पुरी खा खाकर वे खुशी से फूली नहीं समाती थीं। उनकी प्रसन्नता का कहीं कोई ओर-छोर नहीं होता था।

निकहत बेगम को पूरा गाँव अब ‘मिर्जा भाभी’ कहकर बुलाने लगा था। गाँव में कहीं भी शादी-ब्याह या कोई खुशी का अवसर हो, मिर्जा साहब का परिवार अब जरूरी हिस्सा हो गया था। निकहत बेगम यानी मिर्जा भाभी के बगैर तो जैसे उनके घर का जश्‍न ही अधूरा रहता था। मिर्जा भाभी मेहँदी भी क्या खूब माँडती थी, जैसे खुदा का दिया कोई हूनर हो उनके हाथों में। और तो और उनके हाथों की रचाई मेहँदी रंग भी खूब लाती थी।

गाँव की प्राथमिक शाला में बच्चों की संख्या और बढ़ गई थी और तीन नए शिक्षक भी आ गए थे। इस तरह प्राथमिक शाला में मिर्जा साहब को मिलाकर अब कुछ छः शिक्षक हो गए थे। मीडिल स्कूल अब हाईस्कूल में तब्दील हो गया था और शिक्षक भी तकरीबन दस हो गए थे। तीन साल पहले आए माताचरण मिश्रा माट्साब और दो-डेढ़ साल पहले पदस्थ हुए लखनसिंह चौहान माट्साब भी गाँव में ही घर बनाकर रहने लगे थे।

मिर्जा साहब के साथ शुरू से प्राथमिक स्कूल में पढ़ा रहे बड़ोले माट्साब ने भी गाँव की मुख्य सड़क के एक ओर करीम की दुकान से थोड़ा आगे करके अपना छोटा-सा घर बनवा लिया था। हालाँकि बड़ोले माट्साब ने यहाँ बसने का निर्णय काफी देर से लिया था। उनसे उनका पैतृक गाँव नहीं छूट रहा था और उनके पिता यहाँ आने को राजी नहीं हुए थे। अपने पिता के मरने के कुछ दिनों बाद ही बड़ोले माट्साब ने अपना बोरिया-बिस्तर समेटा और टेमनीहाँई में हमेशा के लिए आ गए थे।

श्रावण मास में जब राम मंदिर में रोज रामायण पाठ होता तो कभी कभी आतिफ और असलम अपने पिता मिर्जा साहब से जिद करते कि वे भी मंदिर में जाएँगे क्योंकि उनके सारे दोस्त वहाँ होते थे और वे अगले दिन स्कूल में सबको रामायण पाठ के दौरान और बाद में हुए हँसी-मजाक के मजेदार किस्से सुनाते थे। मिर्जा साहब मुश्‍क‍िल से अपने बच्चों को समझा पाते थे लेकिन फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि रात में रामायण पाठ से पहले असलम के सहपाठी मित्र गणेश, धरम, संजय सब असलम को बुलाने के लिए आ गए। तब मिर्जा साहब ने भी उन्हें नहीं रोका। आतिफ ने भी असलम के साथ जाने की जिद की तो उसे भी भेज दिया। निकहत बेगम उस दिन थोड़ा खफा-सी हुई और मिर्जा साहब से बोली, -‘‘अपनी तरह अपने बच्चों को भी काफिर बनाकर छोड़ेंगे आप ?’’

-‘‘हा…..हा…..हा।’’ मिर्जा साहब पहले तो हँस दिए, फिर बोले, -‘‘बेगम, खुदा तो एक है। हम ही उसे अलग अलग नाम से पुकारते हैं। उसकी अलग अलग तरीकों से इबादत करते हैं।’’

निकहत बेगम समझदार और दुनियादार औरत थी। वे ज्यादा कुछ नहीं बोलीं। आतिफ और असलम का एक बार रामायण पाठ में जाना शुरू हुआ तो फिर धीरे धीरे वे दोनों मंगलवार और शनिवार को होने वाले सुन्दरकाण्ड में भी जाने लगे। गाँव के कुछ लोगों को यह अटपटा जरूर लगता था लेकिन इसे लेकर किसी ने कोई बहुत ज्यादा आपत्ति नहीं की थी।

और चूँकि आतिफ और असलम सुन्दर काण्ड में आने लगे थे तो सुन्दरकाण्ड की आरती में आने वाले आधे पैसे राम मंदिर प्रांगण में रखी मस्जिद निर्माण की दान-पेटी में जाने लगे थे। यह एक अघोषित नियम बन चुका था। पूरा गाँव दिल से चाहता था कि मिर्जा साहब की इच्छा के मुताबिक उनके खुदा की इबादत के लिए गाँव में एक छोटी-सी मस्जिद जरूर बन जाए।

 

बानवे के बाद

मिर्जा साहब ने बलदेव ठाकुर के बड़े लड़के रघुवीर को अपनी पीड़ा बताई। रघुवीर अब गाँव का मुखिया हो गया था। हालाँकि बलदेव ठाकुर जिंदा थे और ईश्‍वर की दया से स्वस्थ भी थे लेकिन बुढ़ापा तो बुढ़ापा होता है और बुढ़ापे की थकान उनके चेहरे पर भी थी।

  • ‘‘अरे मिर्जा साहब आओ! आओ! कैसे आना हुआ ?’’ मिर्जा साहब को देखते ही रघुवीर सम्मान से खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर बोला।
  • ‘‘तुमसे थोड़ा काम था इसीलिए आया हूँ।’’ मिर्जा साहब ने कहा तो रघुवीर सोच की मुद्रा में आ गया।
  • ‘‘हाँ….. हाँ, कहिए न, मैं क्या कर सकता हूँ आपके लिए ?’’
  • ‘‘बेटा अगर तुम राजेश कारीगर से बात कर सको कि मस्जिद का काम बंद क्यों कर रखा है तो बड़ी मेहरबानी होगी।’’
  • ‘‘तो क्या मस्जिद का काम बंद है ?’’ रघुवीर ने पूछा तो मिर्जा साहब मन ही मन हैरान हुए कि सारे गाँव को यह मालूम है कि मस्जिद का काम पिछले कईं महीने से जस-का-तस पड़ा है। फिर रघुवीर को यह खबर कैसे नहीं है। फिर भी मिर्जा साहब अपने मन का संदेह छुपाते हुए बोले, -‘‘हाँ, बेटा तीन-चार महीने से बंद है और मैं जब भी राजेश कारीगर से बात करता हूँ तो किसी न किसी बहाने टाल जाता है। मैंने उससे कहा भी कि अगर तुम्हें नुकसान हो रहा हो तो मेहनताना आधे के बजाए पूरा ले लो लेकिन काम चालु कर दो मगर वह आज-कल करते रहता है। रघुवीर बेटा, अगर तुम कहोगे तो टाल नहीं पाएगा।’’
  • ‘‘ठीक है मिर्जा साहब, मैं आज शाम को राजेश को घर बुलाकर बात करता हूँ।’’ रघुवीर से आश्‍वासन पाकर मिर्जा साहब थोड़े आश्‍वस्‍त हो गए थे। और रघुवीर के घर से निकलने के बाद सीधे सुन्दरलाल प्रजापत के घर गए थे। मस्जिद निर्माण के लिए ईंटे सुन्दरलाल प्रजापत और उसके चचेरे भाई हीरालाल प्रजापत के भट्टे से ही आने वाली थीं जिन्होंने मस्जिद निर्माण के लिए आधी-आधी ईंटे देने की घोषणा की थी। सुन्दरलाल प्रजापत अपने घर के पास ही मिल गया और मिर्जा साहब को आया देखकर सकुचा गया।
  • ‘‘राम राम, सुन्दर भाई।’’ मिर्जा साहब ने सुन्दर भाई को गाँव की परिपाटी के मुताबिक राम राम किया।
  • ‘‘राम राम मिर्जा साहब। और कैसे हैं ?’’
  • ‘‘ठीक हूँ भाई। अभी रघुवीर से बात करके आया हूँ। रघुवीर ने बोला है कि राजेश कारीगर को कहकर वे मस्जिद का काम जल्द ही फिर से शुरू करवाएँगे।’’
  • ‘‘ये तो बहुत अच्छी बात है मिर्जा साहब।’’
  • ‘‘अब तुम ईंटें तैयार रखना। कल-परसों में काम चालु करना है।’’
  • ‘‘अरे आप बेफिक्र रहिए मिर्जा साहब! आपका काम शुरू होने से पहले ईंटें पहुँच जाएगी। बस!’’
  • ‘‘शुक्रिया! सुन्दर भाई।’’

मिर्जा साहब खुश थे और भरोसे पर थे कि अब मस्जिद का काम जो सिर्फ प्लीन्थ तक आकर रुक गया था, अब फिर शुरू हो जाएगा। दो-तीन दिन बाद भी काम शुरू होने के कोई आसार नजर नहीं आए तो वे राजेश कारीगर के घर सुबह-सुबह जा धमके। राजेश उन्हें इतनी सुबह अपने घर आया देखकर सिटपिटा गया।

  • ‘‘राम राम मिर्जा साहब! सुबह-सुबह कैसे आना हुआ ?’’ राजेश ने झूठी मुस्कराहट अपने चेहरे पर लाते हुए कहा।
  • ‘‘राजेश भाई, वही मस्जिद के काम के लिए आया हूँ। तुम काम शुरू करो तो मन को चैन पड़े।’’
  • ‘‘काम तो मैं कल या परसो से ही शुरू कर दूँगा। आप ईंटों का और सीमेंट, सरिये का बंदोबस्त कर लीजिए।’’
  • ‘‘वो तो मैं आज ही कर देता हूँ। लेकिन तुम काम कल से शुरू कर देना भाई।’’
  • ‘‘अरे आप भरोसा रखिए। आपका सामान आया और मैंने काम शुरू किया। अभी वहाँ सामान नहीं है तो मैं भला वहाँ क्या काम करूँगा? आप ही बताइए ?’’
  • ‘‘तब ठीक है। मैं आज ही सारी व्यवस्थाएँ कर देता हूँ।’’

राजेश कारीगर से रु-ब-रु बात करके मिर्जा साहब को तसल्ली हुई कि काम अब जल्द शुरू हो जाएगा। लेकिन मस्जिद निर्माण स्थल पर न ईंटे पहुँची, न सीमेन्ट और न ही कारीगर राजेश या उसके मजदूर पहुँचे। हाँ, जो थोड़ा पैसा जमा था, उससे लोहे के सरिये खरीद कर निर्माण स्थल पर रखवा दिए गए थे, जो पड़े-पड़े जंग लगने से काले पड़ रहे थे।

मिर्जा साहब बीच बीच में कभी राजेश कारीगर तो कभी सुन्दरलाल प्रजापत के यहाँ तो कभी हीरालाल प्रजापत के घर और कभी कभी रघुवीर के पास पहुँच जाते मगर कभी बात आगे नहीं बढ़ी। हर बार उन्हें आश्‍वासन मिलता, जो उन्‍हें थोड़ी देर के लिए तसल्ली देता मगर फिर बाद में उन्हें बड़ा दुःख पहुँचाता। चूँकि मस्जिद निर्माण का काम राजेश कारीगर ने ले रखा था इसलिए कोई दूसरा कारीगर बीच में उस अधूरे काम को लेना नहीं चाहता था और शायद राजेश कारीगर किसी और को काम लेने भी नहीं दे रहा था।

मिर्जा साहब की बड़ी लड़की जेबा और बड़े लड़के आतिफ का निकाह हो चुका था। और इन दिनों आतिफ की पत्नी सादिया की गोद में एक बच्चा भी था। आतिफ गाँव में ही खेती बाड़ी का काम सम्भालने के अलावा घर पर आटा चक्की चलाने का काम करता था। शुरू में पढ़ने में तेज आतिफ ने हाईस्कूल तक आते आते पढ़ाई से मुँह मोड़ लिया था जबकि असलम जो बचपन में खेलने-कूदने में ज्यादा दिलचस्पी लेता था, बाद में पढ़ने-लिखने में उसका मन लग गया था और शहर के कॉलेज में बी.एससी. की पढ़ाई कर रहा था। लेकिन वह शहर में अपने चाचाओं के घर पर न रहकर गाँव से रोज सुबह-शाम आना-जाना करता था।

टेमनीहाँई में अब आने-जाने के साधन बढ़ गए थे। पहले जहाँ एक ही बस सुबह-शाम आती जाती थी। अब सुबह-दोपहर-शाम को दो दो तीन तीन बसें और छोटे टैम्पों चलने लगे थें। करीम की गुमठी जिस मुख्य मार्ग पर थी, उसके आसपास और सामने की पूरी पट्टी में बीसेक गुमठियाँ अलग-अलग काम धंधों के लिए खुल गई थी। गाँव धीरे धीरे अपना आकार बढ़ा रहा था।

जरीना और जिया दोनों ही जवान और शादी लायक उम्र में आ गई थीं। जरीना ने बारहवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी जबकि जिया अभी बारहवीं पढ़ रही थी। जिया जो बचपन में बेहद संजीदा थी, समय के साथ थोड़ा खुल गई थी। जबकि हमेशा हँसते-मुस्कराते रहने वाली जरीना अब उखड़ी-उखड़ी और उदास रहने लगी थी।

जरीना की उदासी के पीछे राहुल से उसके प्रेम सम्बन्ध का टूटना भी एक कारण था। दरअस्ल राहुल चाहता था कि जरीना उसके साथ भाग कर शादी कर ले जबकि जरीना घर से भाग कर शादी करने के खिलाफ थी और उसने राहुल को साफ इंकार कर दिया था कि वह अपने अब्बु और अम्मी को दुनिया के सामने रुसवा करके नहीं भागेगी। राहुल जरीना के जवाब से खफा हो गया था।

राहुल ने, जरीना के बारे में अपने घर पर बात की थी तो उसके पिता अवध नारायण ने राहुल को साफ साफ और कड़े शब्दों में बता दिया था कि, ‘ऐसा सपने में भी मत सोचना कि एक मुसलमान की लड़की उनके घर में बहू बनकर आ सकती है।’ तब राहुल के सामने एक ही विकल्प बचा था कि वह जरीना हो लेकर भाग जाए। उसे भरोसा था कि कुछ समय बाद लौटकर आने पर सब सामान्य हो जाएगा। लेकिन जरीना को राहुल का प्रस्ताव पसंद नहीं आया और वह किसी हालत में भागकर शादी करने पर सहमत नहीं हुई।

जरीना ने भी राहुल से साफ साफ कह दिया कि, ‘अगर मुझसे शादी करना है तो अपने पिता से कहो कि मेरे अब्बु से बात करे। मेरे अब्बु आजाद खयाल हैं, वे मान जाएँगे।’ लेकिन ऐसा होना नहीं था, और न हुआ। अन्ततः राहुल और जरीना की प्रेम कहानी दो धर्मों के बीच की फाक में कहीं दबकर खप गई थी।

बलदेव ठाकुर चूँकि बुढ़े हो गए थे इसलिए अब खेत में स्वयं लगभग नहीं के बराबर जाते थे। इसलिए मिर्जा साहब के यहाँ हमेशा आने वाली तरकारियाँ महीने बीस दिन में एकाध बार आने लगी थीं। और कुछ समय बाद, आना ही बंद हो गई। मिर्जा साहब ने इस परिवर्तन को नोटिस तो किया, मगर उनके पास खुद को बहलाने का तर्क मौजूद था कि, ‘अब बलदेव ठाकुर खुद तो खेत में जाते नहीं। उनके बेटे भी जाते नहीं। सारा काम-काज मजदूरों के हाथों में होता है, सो पराये मजदूर रिश्‍तों की अहमियत को क्या समझे ?’

रामदीन काका स्वर्ग सिधार चुके थे और उनके तीनों बेटों ने उनकी मौत के पहले ही मुफ्त का दूध मिर्जा साहब के घर पहुँचाना धीरे-धीरे बंद कर दिया था। यहाँ तक कि उनका मिर्जा साहब के घर में आना जाना भी धीरे-धीरे कम हो गया था। मिर्जा साहब ने यह परिवर्तन भी नोटिस किया था, मगर उनके तर्कसंगत मन ने उन्हें बताया कि, अब बेटों पर बड़े परिवार का बोझ है और समय के साथ महँगाई भी बढ़ रही है। सो वे नजरअंदाज कर गए।

मिर्जा साहब की गाँव में नौकरी कायम थी और वे बच्चों को पढ़ाते भी थे लेकिन उनके घर में अब फसल की उपज पर आने वाले अनाज और दालों का आना बहुत कम हो गया था, जबकि स्कूल में बच्चों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई थी। जब निकहत बेगम ने इस परिवर्तन की ओर मिर्जा साहब का ध्यान कराया तो मिर्जा साहब को कुछ न सुझा और वे अचकचाकर अपनी बेगम से बोले कि, -‘बेगम, अब वैसे लोग नहीं रहे। वैसी सस्तई का जमाना भी नहीं रहा। हमें जमाने के साथ चलना होगा। अपनी सोच को बदलना होगा।’ निकहत बेगम की समझ में मिर्जा साहब का तर्क नहीं आया था। खुद मिर्जा साहब भी अपने तर्क से संतुष्ट नहीं थे।

मिर्जा साहब को भरोसा था कि उनका गाँव टेमनीहाँई अब भी पहले जैसा ही था। मिर्जा साहब के पास अपने भरोसे को देने के लिए अपने लाचार तर्क थे कि जब दो साल पहले बाबरी मस्जिद टूटी थी, तब देश भर में फसाद फैले थे, मगर अपने गाँव की फिज़ा में उस घटना की बू तक न फैली थी। यहाँ का जीवन वैसे ही चलता रहा। लोग पहले की तरह हँसते-बोलते-मिलते रहे। मिर्जा साहब के तर्क उनके भीतर उठे किसी भी संषय को मसल कर रख देते और उनका अपने गाँव और अपने गाँव के लोगों पर भरोसा कायम रहता।

ये तो कुछ बातें थी जिन्हें मिर्जा साहब और उनकी बेगम ने नोटिस किया था लेकिन कुछ छोटे-छोटे परिवर्तन और उन दिनों हो रहे थे, जिन्हें वे नोटिस नहीं कर पाए। मसलन हो सकता है कि यह कोई इत्तफाक हो मगर राम मंदिर पर अब दो छोटे लाउड स्पीकर की जगह चार बड़े आकार के लाउड स्पीकर लग गए थे और उनके से दो का मुँह शायद किसी मानवीय भूल या गलती से मिर्जा साहब के घर की तरफ था।

जिया अपने अब्बु अम्मी से अक्सर शिकायत करती कि, मंदिर वालों से बोलना कि रात दिन इन भोंगों को बजाना बंद करें या कम से कम आवाज थोड़ी कम कर दें ताकि वह अपनी पढ़ाई कर सके। मिर्जा साहब ने मंदिर वालों को एक बार टोका भी कि, ‘भाई जरा लाउड स्पीकर की आवाज थोड़ी कम रखा करें।’ तो उन्हें अपनी उम्मीद के उलट टका-सा जवाब मिला था कि, ‘अब तुम लोगों को हमारे भजन भी अखरने लगे। और किसी को तो गाँव में कोई तकलीफ नहीं होती, सिर्फ तुम्हें ही क्यों होती है।’

मंगलवार और शनिवार की रात को होने वाले सुन्दरकाण्ड में आतिफ और असलम ने बरसों से जाना छोड़ दिया था। उनके अब्बु ने उनसे कभी पूछा नहीं था और उन्होंने भी कभी बताया नहीं था कि क्यों ? क्यों जाना छोड़ दिया था ? दरअस्ल आतिक या असलम के मंदिर में प्रवेश से लोगों को धीरे-धीरे आपत्तियाँ होने लगी थीं। आधे से ज्यादा लोग उनके मंदिर में आने को अपने धर्म के अपमान की तरह देखने लगे थे। खासकर मंदिर के पुजारी शर्माजी और उनके बेटों ने तो विधर्मियों के इस तरह मंदिर में आने को मंदिर के लिए गलत और अपवित्र बताया। आतिक और असलम ने जब लोगों को उनके बदले लड़ते और बहस करते देखा तो खुद ही मंदिर में आना छोड़ दिया।

सुन्दरकाण्ड तो पहले भी होता था लेकिन अब लाउड स्पीकर पर जोर-जोर से पढ़ा जाने लगा था और सुन्दर काण्ड में आने वाले युवाओं की तादाद भी आश्‍चर्यजनक रुप से बढ़ गई थी। राम मंदिर में हर साल भागवत कथा का आयोजन होता था लेकिन अचरज की तरह साल दर साल यह आयोजन वृहद होने लगा था। पाण्डाल हर साल बढ़ता जा रहा था। बाहर के विशेष भागवत कथा वाचकों को बुलवाया जाने लगा था। पास-पड़ोस के गाँवों से भी बड़ी आबादी इन प्रवचनों को सुनने आने लगी थी। और यह भी कि आसपास के सब गाँवों में बारी-बारी से ऐसे बड़े धार्मिक आयोजनों की संख्या किसी इत्तफाक की तरह बढ़ गई थी।

एक छोटी-सी मगर गाँव के इतिहास की सबसे बड़ी घटना यह हुई कि राम मंदिर प्रांगण से वह दान पेटी चोरी हो गई जिसमें मस्जिद निर्माण के लिए पैसा इकट्ठा किया जा रहा था।

 

दो हजार दो के बाद

मिर्जा साहब के बड़े भाई सादिक मिर्जा अपने बेटे गुलफाम के साथ टेमनीहाँई में आए हुए थे। खाना खाने के बाद बुढ़े सादिक भाई धीरे से अपने छोटे भाई को समझाते हुए बोले, -‘‘अब्दुल तुम्हें पहले भी कईं बार कहा है और अब फिर कहता हूँ, तुम शहर में वापस आ जाओ। इस मुल्क में अब हम लोगों का इस तरह अलग-अलग बिखर कर रहना ठीक नहीं।’’

-‘‘भाईजान मेरा जवाब अब भी वही है। मैं यह गाँव छोड़कर नहीं जाऊँगा। यहाँ मेरा घर-बार, खेती-बाड़ी और नौकरी-पानी है। यहाँ मेरे बच्चे पढ़े-लिखे और बढ़े हुए हैं। यहाँ मैंने अपनी जिंदगी के तीस से ज्यादा साल गुजारे हैं। और अब कुछ महीनों बाद रिटायरमेंट होने के बाद यहीं बची खुची जिंदगी गुजारना चाहता हूँ। यहाँ की आबोहवा को छोड़कर कहीं और अब मन नहीं लगेगा।’’ मिर्जा साहब ने अपने मन की बात बताई तो उन्हें खुद भी अपना मन हल्का लगा।

  • ‘‘अब्दुल, तुम नहीं जानते अभी गुजरात में क्या हुआ हमारे लोगों के साथ ?’’
  • ‘‘जानता हूँ लेकिन वो गुजरात था। यह टेमनीहाँई है। मेरा गाँव है।’’
  • ‘‘तुम समझ नहीं रहे हो अब्दुल। पूरा मुल्क अब कभी भी गुजरात हो सकता है। हम अगर दो दो चार चार अलग अलग रहेंगे तो हमेशा दबकर रहेंगे। लेकिन अगर हम अपने लोगों वाले इलाकों में रहेंगे, संगठित रहेंगे तो हमें एक दूसरे का सहारा रहेगा। खुदा न करे, यहाँ कल-कदार कुछ हो गया तो कोई देखने-बोलने वाला भी नहीं है।’’
  • ‘‘नहीं भाईजान! मैं अपना फैसला नहीं बदलूँगा। मेरा मन नहीं मानता।’’ मिर्जा साहब ने अपना फैसला सुनाया।

सादिक भाई ने फिर आतिफ और असलम को भी समझाया। आतिफ और असलम दोनों ही अपने ताये अब्बु की बातों से सहमत हो गए थे, मगर अपने अब्बु-अम्मी को इस गाँव में अकेला छोड़कर जाने को तैयार नहीं थे। और फिर उस पर दोनों का गाँव में जमा-जमाया धंधा-पानी था। आतिफ की आटा चक्की और खेती-बाड़ी का काम पहले से था। असलम ने भी कॉलेज करने के बाद, कहीं नौकरी करने के बजाए अपने गाँव की स्कूल, जो हायर सेकेण्डरी स्कूल हो गई थी, के पास स्टेशनरी और एसटीडी पीसीओ की एक दुकान डाल ली थी।

अन्ततः सादिक भाई भी और लोगों की तरह हारकर लौट गए। मिर्जा साहब नहीं माने तो नहीं माने।

मिर्जा साहब के साले करीम को भी इसी तरह कईं लोगों और रिश्‍तेदारों ने गाँव से वापस चले जाने को कहा था, मगर वो भी गाँव छोड़कर जाने को तैयार नहीं हुआ था।

करीम का परिवार भी बड़ा हो गया था। बड़ा बेटा नावेद कॉलेज पढ़ने जाता था। और नावेद से दोनों छोटे बेटे और एक बेटी गाँव की स्कूल में पढ़ते थे। नावेद दुबला-पतला साफ रंग का देखने में आकर्षक लड़का था और उसे यह भ्रम था कि गाँव के मुखिया रघुवीर की बेटी पूजा के साथ चल रहे उसके प्रेम प्रसंग को सिर्फ और सिर्फ उसका दोस्त संदीप ही जानता है और कोई नहीं।

पूजा भी शहर के उसी कॉलेज में पढ़ने जाती थी, इसलिए दोनों गाँव में अपने प्रेम को रहस्य रखने की भरपूर कोशिश करते। वे दोनों सिर्फ शहर के कॉलेज में ही मिलते-जुलते और बातें करते थे।

गाँव की फिज़ा में जहर घुलने की शुरुआत बानवे के बाद ही हो गई थी जिसे खुद गाँव भी गंध नहीं पाया था और ऐसे माहौल में नावेद और पूजा ने घर से भागकर अपने गाँव को एक तरह से मुसीबत के मुहाने पर खड़ा कर दिया था, खासकर नावेद ने अपने परिवार को।

जब गाँव में खबर फैली कि नावेद, पूजा को भगाकर कहीं ले गया है तो मुखिया रघुवीर और उसके परिवार वालों ने इसे अपने धर्म पर हमला करार दिया और उसी रात उन्होंने गाँव के बहुत से युवाओं और अपने रिश्‍तेदारों को साथ लेकर बदले में करीम की गुमठी में आग लगा दी। फिर मुखिया के लोगों ने स्कूल के पास वाली असलम की दुकान को भी आग के हवाले कर दिया। इतने पर भी उन लोगों का जी नहीं भरा तो वे इकट्ठे होकर करीम के घर की ओर बढ़ गए थे।

नावेद के दोस्त संदीप ने ऐसे हालात में अपनी दोस्ती निभाई और वह नावेद के घरवालों को सुरक्षित अपने घर ले गया। चूँकि करीम, मिर्जा साहब का साला था और उसका घर मिर्जा साहब के पास ही था तो करीम के घर की आग ने जल्द ही मिर्जा साहब के घर को भी अपनी चपेट में ले लिया। सम्भव तो यह भी था कि मिर्जा साहब के घर को भी उस उग्र भीड़ ने जानबुझकर निशाना बनाया हो। मिर्जा साहब के परिवार के लोगों को ऐसे कठिन समय में उनके पास-पड़ोस के लोगों ने अपने यहाँ शरण दी थी।

देर रात के बाद जब माहौल कुछ ठण्डा हुआ तो मिर्जा साहब और करीम दोनों के परिवार सुबह होने से पहले ही शहर के लिए रवाना हो गए थे।

 

दो हजार बारह के बाद यानी हाल-फिलहाल

मिर्जा साहब टेमनीहाँई से जब मुँह अँधेरे निकले तो फिर वापस गए ही नहीं। नौकरी से तो वैसे भी मिर्जा साहब रिटायर हो चुके थे। अपने घर-खेत-दुकानें कुछ भी देखने वापस दोबारा पलटकर नहीं गए। उनके पास सिर्फ खबरें आती रहीं कि वहाँ उनके घर जला दिए गए हैं। और खेतों पर पड़ोस के खेत वालों ने कब्जा कर लिया है।

चूँकि मिर्जा साहब के पास अपनी जमीनों के पर्याप्त कागज पत्तर थे इसलिए मिर्जा साहब के बेटों ने कचहरी में अपने घर-खेत हासिल करने के लिए मुकदमें दायर कर रखे थे। और लगभग छः साल की जद्दोजहद के बाद उनके पक्ष में फैसला आया था।

आतिफ ने मिर्जा साहब को बताया कि वह असलम के साथ टेमनीहाँई जा रहा है, वहीं पर अपने घर और खेत की जमीनें बेच देगा। संदीप ने गाँव में किसी से बात कर रखी है जो हमारी जमीनें खरीदना चाहता है। मिर्जा साहब को टेमनीहाँई की उस समय खूब याद आई और उनकी आँखों से आँसू झर आए। आँखें तो आतिफ की भी गीली हो गई थीं, बस वह अपने आप पर किसी तरह काबू किए हुए था।

मिर्जा साहब ने कहा कि वह भी टेमनीहाँई साथ चलेंगे।

मिर्जा साहब जब आतिफ के साथ टेमनीहाँई आए तो अपने जले हुए घर को देखकर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रो दिए थे। ऐसे समय में आतिफ ने मुश्‍क‍िल से उन्हें सम्भाला था।

संदीप ने गाँव के एक साहूकार के साथ मिर्जा साहब के घर, खेत और स्कूल के पास वाली दुकान का सौदा करवा दिया था। लेन-देन और लिखा-पढ़ी की कार्रवाई के बाद जब मिर्जा साहब राम मंदिर प्रांगण से थोड़ी आगे करके अधूरे मस्जिद निर्माण के पास से गुजरे तो अचानक उनके कदम ठिठक गए। मिर्जा साहब ने देखा, अधूरे मस्जिद निर्माण स्थल पर ईंटों का ताजा ढेर जमा हुआ है और उस निर्माण स्थल के ऊपर एक फ्लैक्स का बैनर टँगा है, जिस पर आदमकद हनुमानजी की तस्वीर बनी हुई है और बड़े बड़े अक्षरों में लिखा हुआ है, ‘भव्य हनुमान मंदिर का निर्माण’ और उसके नीचे दानदाताओं से मंदिर निर्माण के लिए दान देने की अपील की गई है।

मिर्जा साहब ने उस निर्माण स्थल के पास रखी दान-पेटी को देखा तो पहचान लिया, यह वही दान पेटी थी जो राम-मंदिर प्रांगण से किसी अचरज की तरह गायब हो गई थी। मिर्जा साहब हौले से मुस्कराए और अपने झोले में रखे रुपए की गड्डियों में से पाँच सौ रुपए का एक नोट निकाला और उस दान-पेटी में डाल दिया। और फिर आगे बढ़ गए।

 

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प्रदीप जिलवाने

12, काला खेत, के. के. कान्वेंट स्कूल के सामने, खरगोन 451 001 म.प्र. मोबाइल: 097559 80001
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