सोशल मीडिया – नफरत का नया प्लेटफॉर्म

साम्प्रदायिकता का नया औजार बना Social Media

Story Highlights
  • सोशल मीडिया प्लेटफार्म नफरत फैलाने और हिंसा भड़काने का आसान ज़रिया हो गए हैं
  • सोशल प्लेटफॉर्म को मज़हबी जंग का अड्डा बना दिया गया है
  • सरकार सांप्रदायिकता फैलाने वालों की अनदेखी कर रही है
  • पूर्वी दिल्ली में हुए दंगे 4 दिन तक चले थे और 45 लोगो की मौत हुई थी
  • किसान आंदोलन को धार्मिक और अलगाववादी रंग दिया जा रहा है
  • सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही नफरत लोगों के मन-मस्तिष्क को क़त्ल कर रही है

देश डिजिटल हो रहा है और नफरत भी डिजिटल हो चली है। भारत में सोशल मीडिया प्लेटफार्म नफरत फैलाने और हिंसा भड़काने का आसान जरिया हो गए हैं। अब सांप्रदायिक तत्वों को ज़्यादा मेहनत नहीं करना पड़ती है, सोशल मीडिया ने उनका काम आसान कर दिया है! हालांकि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जोड़ने के लिए बनाए गए हैं, लेकिन भारत में इसका इस्तेमाल सामाजिक बँटवारे के लिए किया जा रहा है। सोशल प्लेटफॉर्म को मज़हबी जंग का अड्डा बना दिया गया है। जिस पर आए दिन शेर, शूरवीर और धर्म के रक्षक जन्म ले रहे हैं। एक धर्म की रक्षा और दूसरे मज़हब को कोसना, ऐसे मुददे गढ़ना जिनका सचाई से कोई लेना देना नहीं है, यही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मस का शग़ल बन गया है। यहीं पर कभी नेहरू को मुस्लमान बताया जाने लगता है, कभी हरे झंडे को पाकिस्तानी झंडा बता दिया जाता है। एक समुदाय को डराकर उनके वोट बटोरने के लिए ओवैसी को आने वाले वक़्त का प्रधानमंत्री तक बता दिया जाता है। इस तरह और भी ऐसे मुददे हैं जो सोशल मीडिया पर दौड़ कर लोगों को भ्रमित कर रहे हैं। देश में नफरत के एजेंडे को सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर रोकने में जो प्रमुख रूकावटे हैं, उसमें से एक है सरकारों का सांप्रदायिकता फैलाने वालों की अनदेखी करना। सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स ने इस संबंध में चीज़ों में कुछ बदलाव करने की कोशिश की है मगर फिलहाल वह नाकाफी है। फ़िलिपींस और जर्मनी ने सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने वाली सामग्री पोस्ट करने वालो के खिलाफ कानून बना दिया है, लेकिन हमारे देश में इस तरह की सामग्री को रोकने के लिए अभी पुराने क़ानूनों की ही मदद ली जा रही है। इस पर होने वाली कार्रवाई का स्वरूप भेदभाव से पाक होने की ज़रूरत है। 

एक राजनीति दल जिसकी ताकत ही सामाजिक दूरियों में निहित है, वह नफरत भरे संदेशों को काबू करने में क्योंकर दिलचस्पी लेगा, यह समझा जा सकता है। इस मामले में देश के संवैधानिक पदों पर बैठे लोग भी पीछे नही हैं, वह भी इसे बढ़ाने का काम ही करते दिखाई पड़ते हैं। सोशल मीडिया की भीड़ दिन प्रतिदिन बेकाबू होती जा रही है। यहाँ से जारी नफरत के संदेशों का हिंसा में तब्दील हो जाना असंभव नही है। इसी साल बैंगलुरु में एक आपत्तिजनक पोस्ट के बाद हिंसा भड़की, तीन लोग मारे गए और 70 से ज्यादा लोग घायल हो गये। दिल्ली दंगे में भी सोशल मीडिया के इस्तेमाल को नकारा नही जा सकता हैं। पिछले करीब दो दशक में यह सबसे बड़ी साम्प्रदायिक घटना थी। एक महिला ने सोशल मीडिया पर दंगों से पहले भड़काऊ पोस्ट की थी, हमें नही पता कि उस पर क्या कार्रवाई हुई… हाँ, यह ज़रूर हुआ कि उसी वीरांगना ने किसान आंदोलनकारियों को फिर सोशल मीडिया से धमकी दे डाली। 

पूर्वी दिल्ली में ये हिंसा 4 दिन तक चली थी दंगे में 45 लोगो की मौत हुई थी। इस तरह की नफरत में दिन बा दिन इज़ाफ़ा होते जा रहा है। इस तरह के फैसबुक सरगना अब सोशल मीडिया पर किसान आंदोलन को सांप्रदायिक रंग देने में जुटे हुए हैं और इसे धार्मिक और अलगाववादी रंग दिया जा रहा है। किसान आंदोलन को दिशाहीन करने की कोशिश जारी है, उसे खास राज्य और खास समूह का आंदोलन कह कर प्रचारित किया जा रहा है। 

फैसबुकिया समूह सरकार के विवादित कानून का समर्थन करता है, जो विरोध करता है वह उस पर टूट पड़ता है। हिंसा के मार्फत किसान आंदोलन को ख़त्म करने की पैरवी करता है। सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही नफरत लोगो के मन-मस्तिष्क को क़त्ल कर रही है। इसे आप ऐसे भी समझ सकते हैं जैसे कि लोगो को एक अंधेरे गड्डे में उतार दिया गया है और उस से निकलने के लिए उन्हें एक रस्सी दी गई है, जिसका इस्तेमाल लोगो की मज़बूरी है। 

रविश कुमार सही कहते हैं नफरत और फेक न्यूज़ फैलाने वालो को सज़ा देने के बजाए उस पर यकीन करने वालो को सज़ा दी जाए। पिछले कुछ वर्षो में सरकार के नोटबंदी, जीएसटी, एनआरसी, सीएए और कृषि कानून जैसे अप्रिय फैसलों के बाद 495 लोगों की जानें चली गईं, इस सब के बावजूद लोगो को खतरा समुदाय विशेष से बताया जाता है, उनके अंदर जो डर बैठाया जा रहा है, वो डर उनको कमज़ोर कर रहा है और सत्ता को मज़बूत ! 

इस मौज़ू पर शकील जमाली साहब का एक शेर याद आ रहा है 

तबाह कर दिया अहबाब को सियासत ने
मगर मकान से झंडा नहीं उतरता है ! 

आपके लिए यह रिपोर्ट लिखी है मेरे सहयोगी अम्मार अंसारी ने।

आपके ज़हन में कई सवाल घूम रहे होंगे, उन्हें कमेंट के माध्यम से बता दें, जिससे हमारी यह चर्चा आगे बढ़ सके। अगर आपको यह वीडियो पसंद आई हो तो इसे अपने साथियों के साथ शेयर ज़रूर करें। और अगर अपने अभी तक हमारे चैनल स्पार्क न्यूज़ को सब्सक्राइब नहीं किया है तो ज़रूर कर लें और सामने बने बेल आइकन को भी दबा दें, जिससे हमारी हर वीडियो आप तक तुरन्त पहुंचती रहे। जन पत्रकारिता को आगे बढ़ाने के लिए आपका सहयोग ज़रूरी है।

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Shahnawz 'Sahil'

पत्रकारिता से करियर शुरुआत की, विज्ञापन एवं डिज़ाइन के क्षेत्र में कार्यरत तथा ग़ालिब के शहर दिल्ली में रहता हूँ...

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