लखीमपुर में नाबालिग के साथ गैंगरेप और जघन्य हत्या

महिलाओं के साथ हैवानियत आखिर कब तक?

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में शौच के लिए घर से बाहर गई एक 13 साल की नाबालिग दलित छात्रा के साथ दरिंदों ने वहशीपन की सभी सीमाओं को पार करते हुए ना सिर्फ गैंगरेप किया गया बल्कि उसकी आंखें फोड़ दी गई, जीभ काट दी गई और गले में पट्टा डालकर घसीटा गया।

इस मासूम दलित छात्रा के साथ गैंगरेप और हत्या के मामले में पूर्व सीएम तथा समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने योगी सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए आरोप लगाया है कि यूपी में बीजेपी राज में महिलाओं विशेषकर बच्चियों का उत्पीड़न चरम पर है। उन्होंने ट्वीट किया, “उप्र के लखीमपुर खीरी में एक बेबस किशोरी से दुष्कर्म के बाद निर्मम हत्या इंसानियत को झकझोर देने वाली घटना है। भाजपाकाल में उप्र की बच्चियों व नारियों का उत्पीड़न चरम पर है।” उन्होंने ट्वीट में आगे कहा, “बलात्कार, अपहरण, अपराध व हत्याओं के मामले में भाजपा सरकार प्रश्रयकारी क्यों बन रही है?”

हालांकि प्रशासन आंखे फोड़े जाने और जीभ काटे जाने की बात को गलत बता रहा है। लखीमपुर एसपी ने कहा है कि इस मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया है और उनके खिलाफ NSA के तहत कार्रवाई की जा रही है।

दूसरी तरफ इस मामले में उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री तथा बीएसपी अध्यक्ष मायावती ने योगी सरकार के साथ-साथ पूर्व की अखिलेश सरकार पर भी हमला बोला है। उन्होंने दलित नाबालिग के साथ बलात्कार और उसके बाद नृशंस हत्या को बेहद दुःखद और शर्मनाक बताते हुए सवाल किया कि अगर अभी भी ऐसी जघन्य वारदाते हो रही हैं और अपराधियों के हौसले बुलंद हैं तो फिर पूर्व की समाजवादी पार्टी तथा वर्तमान भाजपा सरकार में क्या अन्तर रहा? उन्होंने दोषियों के विरूद्ध भी सख्त से सख्त कार्रवाई की मांग की।

ऐसे ही मेरठ में भी एक 10 साल की बच्ची के साथ भी दुष्कर्म की घटना सामने आई है वहीँ एक 14 साल की बच्ची के साथ उसके सौतेले बाप के द्वारा दुष्कर्म का केस सामने आया है। सख्त कानून भी ऐसे अपराधों को रोकने में नाकाम हो रहे हैं। सवाल यह भी पैदा होता है कि दिल्ली के निर्भया केस के बाद पूरे देश में जो विरोध का माहौल पैदा हुआ था और सरकारों ने जो सख्त कदम उठाए थे, उनका इस तरह की घटनाओं को रोकने पर क्या फर्क पड़ा? हमें यह विचार करना पड़ेगा कि अगर सख्त कानून से भी ऐसी जघन्य वारदाते नहीं रुक पा रही हैं तो फिर इसका हल क्या है? अगर सरकारें फेल हो रही हैं तो समाज क्या कदम उठा सकता है।

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