म्यांमार में तख्तापलट: भारत पर होगा असर या चीन को हुआ नुक्सान ?

भारत के पडोसी देश म्यांमार में तख्तापलट से म्यांमार की राजनीति का दमन होता हुआ नज़र आ रहा है, लेकिन म्यांमार के इन हालातों से क्या भारत पर असर पड़ेगा या चीन को नुक्सान झेलना होगा ?

पडोसी देश म्यांमार में तख्तापलट हो चुका है, सेना ने देश की कमान अपने हाथ में ले ली है और प्रधानमन्त्री आंग सान सू की  समेत नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी के कई नेताओं को हिरासत में लिया गया है। 30 जनवरी को अमेरिका ने म्यांमार की हालिया राजनीति पर टिप्पड़ी करते हुए यह आशंका जताई थी की म्यांमार में तख्तापलट की संभावनाएं हैं और 31 जनवरी की सुबह ही म्यांमार के तमाम न्यूज़ चैनल्स ने यह सूचना जारी कर दी की अभी से उन चैनल्स पर प्रसारित किये जाने वाले सभी प्रोग्राम्स को बंद कर दिया गया है इस सूचना के बाद ही जब तख्तापलट की अटकलें लगायी जाने लगी, उसी के साथ यह ऐलान भी हो गया की धांधलेबाजी के आरोप में आंग सान सू की और उनकी पार्टी के तमाम नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया है और अभी  से आने वाले 1 साल तक देश की बागडोर सेना के हाथों सौंप दी गयी है। यानी म्यांमार में अगले 1 साल तक इमरजेंसी लगा दी गयी है।

बता दें की यह पहली बार नहीं है जब म्यांमार की सत्ता सैन्यबल के हाथों गयी है। इस से पहले 1962 से 2011 तक म्यांमार की सत्ता सैन्यबल के हाथ में थी। लेकिन म्यांमार को लोकतांत्रिक देश में बदलने के लिए आंग सान सू की ने लम्बी लड़ाई लड़ी। 2010 में म्यांमार में चुनाव के बाद 2011 में म्यांमार में नागरिक सरकार बनायी गयी लेकिन उससे पहले तकरीबन 1 दशक तक म्यांमार, सेना के हाथों कैद था, और अब तख्तापलट के बाद वापस म्यांमार सैन्यबल की बेड़ियों में जकड लिया गया है। यह पहली बार नहीं है जब आंग सान सू की को हिरासत में लिया है, इस से पहले म्यांमार को लोकतांत्रिक देश में बदलने की लड़ाई के दौरान भी वो जेल जा चुकी है।

दरअसल 2020 में ही म्यांमार में चुनाव हुए थे जिन चुनाव में नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी ने संसद के दोनों सदनों में 476 में से 396 सीटें हांसिल की थी लेकिन सेना ने इस चुनाव को गलत बताया क्योंकि 2008 सैन्य संविधान के मुताबिक़ संसद में सेना के पास कुल सीटों का 25 % reserved है और कई प्रमुख मंत्री पद भी सेना के पास ही हैं। इसी मुद्दे को लेकर बीते कई दिनों से सेना और नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी में अनबन जारी थी और सेना भी लगातार हर मुद्दे पर नाराज़गी ज़ाहिर कर रही थी। अब आखिरकार सेना ने म्यांमार की सत्ता एक साल के लिए हथिया ली है। जिसके बाद अब म्यांमार की सत्ता जनरल मीन आंग लिंग के हाथ में होगी। अमेरिका ने तो सैन्यबल को यह चेतावनी भी दे दी है की जल्द से जल्द आंग सान सू की को रिहा किया जाए, वहीँ ऑस्ट्रेलिया और भारत समेत कई देशों ने म्यांमार में लोकतंत्र के इस दमन पर चिंता जताई है।

म्यांमार में यंगून समेत कई जगहों पर इंटरनेट सेवायें बंद कर दी गयी हैं, लोग दुकानों और एटीएम के बाहर कतारों में खड़े है क्यूंकि म्यांमार में रह रहे हर शख्स को इस वक़्त भविष्य का खौफनाक मंज़र सताने लगा है। जहाँ तक बात है भारत पर इस तख्तापलट का क्या असर पड़ेगा तो इसका जवाब किसीको भी ज़्यादा चौंकाएगा नहीं क्यूंकि म्यांमार के राजनैतिक विश्लेषकों के अनुसार म्यांमार में चाहें सैन्यबल की सरकार हो या नागरिक सरकार हो भारत का म्यांमार को और म्यांमार का भारत को समर्थन उसी तरह से जारी रहेगा जिस तरह से अबतक चलता आ रहा है। लेकिन यहाँ चीन को नुक्सान हो सकता है क्यूंकि चीन चाहता है की म्यांमार में नागरिक सरकार ही रहे जिसके सहारे योजना से और रज़ामंदी से वो भारत की सीमाओं में प्रवेश कर पाए।

लेकिन भारत के पडोसी देश म्यांमार की हालिया राजनीति वाकई काफी गंभीर मोड़ पर आ चुकी है, एक बार फिर 1 दशक पहले का इतिहास दोहराया जा रहा है जब आंग सान सु की ने लम्बी लड़ाई के बाद म्यांमार में लोकतांत्रिक सरकार का गठन किया था। पर क्या फिर से सू ची म्यांमार के लिए लड़ाई लड़ेंगी और अगर लड़ेंगी भी तो क्या वो इसमें कामयाब हो पाएंगी, क्या म्यांमार की प्रधानमन्त्री को रिहा किया जाएगा ? इस सवाल का इंतज़ार जारी है।

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