जानिए, दहेज लेने पर किस धारा के तहत होता है मुकदमा

दहेज को समाज में अभी भी बुरी प्रथा के तौर पर देखा जाता है ! लेकिन संविधान में इसके लिए क्या प्रावधान है? जानिए!

दहेज़ प्रथा एक सामाजिक बुराई से आज समाज का हर व्यक्ति परिचित है जिसे 498a के नाम से भी सभी लोग जानते हैं . जो भारतीय दंड संहिता के अनुसार एक दंडनीय अपराध है 498a की परिभाषा के मुताबिक अगर कोई पति या पति का रिश्तेदार किसी महिला को दहेज़ के लिए शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित करता उसका शोषण करता है और इस हद तक महिला का शोषण किया जाता है की वह आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाये और उपरोक्त सभी अपराध महिला के विवाह के 7 साल के अंदर होता है तो यह आई पि सी की धारा 498a की श्रेणी में आता है .

आई पि सी की धारा 498a 1983 के संशोधन के बाद भारतीय दंड संहिता में जोड़ा गया जब दहेज़ प्रथा के अनगिनत केस सामने आने लगे कभी किसी बहु को जलाकर मार दिया जाता था तो कभी कम दहेज़ के लिए उसे धक्के मारकर ससुराल से बहार फेंक दिया जाता था और इसके लिए एक कड़ा कानून बनाना जरुरी हो गया था जिसमे अपराधियों को कड़ी सजा मिले और इसी बात को ध्यान में रखते हुए धारा 498a की अंतर्गत 3 साल तक की सजा और फाइन भी लगाया जा सकता है ! पर किसी भी कानून के अगर कुछ फायदे है तो कुछ नुक्सान भी है जिसकी मार उन लोगो को भी झेलनी पड़ती है जो निरपराधी होते हुए भी कोर्ट कचहरी के चक्कर लगा रहे है ! निचे इस कानून के कुछ फायदे और नुक्सान दोनों ही बता रहे है जो इस प्रकार है .

1. महिलाओं के खिलाफ शोषण को रोकना इस कानून के मुताबिक अगर कोई भी पति या पति का रिश्तेदार महिला से दहेज़ की मांग करेगा और इसके लिए अगर उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करता है तो उसे 3 साल तक की सजा और जुरमाना भी लगाया जा सकता है और किसी भी कानून को सुचारु ढंग से लागु करने के लिए दंड निर्धारित करना बहुत जरुरी है तभी इसका सही से पालन हो सकता है जो हमें देखने को भी मिला है !

2. महिला सशक्तिकरण इस कानून के आने के बाद महिलाओं के अंदर नो दर और घबराहट थी की वे अपने खिलाफ हो रहे अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ कैसे उठाये वह दूर हो गया है और अब वे कंप्लेंट फाइल करने से घबराती नहीं है और अपने अधिकारों के बारे में जानकारी रखते हुए अपनी आवाज़ बुलंद रखती है और अपने ही क्या अगर किसी दूसरी महिला के साथ कोई प्रताड़ना होते देखती है तो उसे भी मदद करती है ताकि वह अपने अधिकारों के बारे में जान सके और सही इस्तेमाल कर सके.

3. आत्महत्या के केसों में भी कमी आई है इस कानून के बाद दहेज़ प्रथा व उत्पीड़न से होने वाली आत्महत्या में भी कमी आई है जो की इस कानून के आने से पहले 40% था.

4. पति और इन लॉज़ अब ज्यादा जिम्मेदार हो गए है इस कानून के तहत मिलने वाली सजा ने दूसरों के लिए उदाहरण पेश किया है जिससे अब महिला का पति और उसके ससुराल वाले ऐसा कोई भी काम नहीं करते जिससे महिला परेशान हो और वे अब अधिक सजग हो गए है.

498a के फायदों में बारे में तो हमने जान लिया पर इसके कुछ नुक्सान भी है जिनके बारे जानना भी उतना ही जरुरी है जो की इस तरह से है :

1. आसानी से गलत इस्तेमाल किया जा सकता है इस कानून का कई महिलाऐं अपने पति और ससुराल वालों को धमकाने के लिए और उनसे मोटी रकम वसूलने के लिए गलत इस्तेमाल कर उनके खिलाफ झूठी कंप्लेंट फाइल कर रही है और झूठे और बेबुनियाद इलज़ाम लगा रही है ताकि उनसे अपनी हर तरह की बात मनवा सके और जायदातर केसेस में हस्बैंड और उसकी फॅमिली विक्टिम होती है फिर भी वे सजा भुगतते है !

2. जाँच में कमी भी इसका एक सबसे बड़ा ड्रा बैक है सिर्फ महिला की कंप्लेंट पर ही बिना किसी जाँच पड़ताल के पति और उसके घरवालों को हिरासत में ले लिया जाता है और यह इतना बढ़ गया की कोर्ट को ďाखलांदाजी करनी पड़ी और इन्वेस्टीगेशन के लिए गाइडलाइन्स जारी किये जिसमे ऐसे मामलों में अरेस्टिंग से पहले 41A सी आर पि सी का नोटिस देना अनिवार्य है और जाँच के बाद अगर लगता है की अरेस्टिंग जरुरी है तो अरेस्ट परमिशन लेना जरुरी है अब इसमें डायरेक्ट अरेस्टिंग नहीं हो सकती .पर ग्राउंड लेवल पर अभी भी सिस्टम में कोई सुधार नहीं है .

3.498a के तहत केस दर्ज़ करवाना एक मुश्किल प्रक्रिया है जिसमे बहुत समय लगता है और कई बार महिलाओ को पुलिस स्टेशन के चक्कर लगाने पड़ते है जिससे वे धीरज खो बैठती है और निराश हो जाती है और एक मैक्सिम के मुताबिक ‘ जस्टिस डिलेड इस जस्टिस डिनाइड ‘ की अगर न्याय मिलने में देरी होती है तो इसका मतलब न्याय नहीं मिला जो इस सन्दर्भ में सत्य भी है .

 

4. साबुत की कमी अगर कोई महिला कंप्लेंट फाइल करती है तो उसे उसके लगाए हुए इलज़ाम साबित करने के लिए साबुत देने होंगे और बहुत सारे केसेस में उनके पास कोई साबुत नहीं होता जैसे किसी का आरोप है की उसके पति ने उसे पिछली किसी तारीख पर थप्पड़ मारा पर इस बात का कोई साबुत नहीं हो सकता और यह साबित करना उसके लिए बेहद मुश्किल है और यही बात पति पर भी लागू होती है वह अपने खिलाफ लगाए आरोपों को गलत साबित करने में असफल रहता है जो अपने आप में केस के डिफीट होने का एक बड़ा कारण है.

 

5. समाज का प्रोत्साहन न प्राप्त होना भी इसमें एक बड़ी समय पैदा करता है आज भी पिछड़ी जगहों पर रहने वाली महिलाओं के परिवार वाले उन्हें कंप्लेंट फाइल करने से रोकते है अगर उन्होंने आवाज़ उठाई तो समाज में उनकी बदनामी होगी और इसी वजह से जो सच में इसका शिकार है उन्हें न्याय नहीं मिल पता क्योंकि वे समाज के डर से सामने नहीं आती कई बार जानकारी का आभाव और पैसे न होने की वजह से वे यह सब सहती रहती है और शहरी महिलाऐं इसका गलत इस्तेमाल करती है.

 

 

हालांकि इस कानून ने महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचारों से काफी हद तक निजाद दिलाई है और महिला सशक्तिकरण को भी बढ़ावा दिया है पर समाज के एक वर्ग को न्याय दिलाने के लिए हम पुरुषों पर कब अत्याचार करने लगे पता ही नहीं चला सो हमें इस बात पर ध्यान देने की जरुरत है की जिनके साथ सच में गलत हुआ है उन्हें न्याय मिले पर किसी निर्दोष को सजा न मिले क्योंकि कोर्ट तो अपना काम कर रही है पर शायद हमें ही अपनी जिम्मेद्दारी का अहसास नहीं है और इसके लिए हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी और ऐसी सामाजिक कुरीतियों को फ़ैलाने रोकना होगा .

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