घरेलु हिंसा पर क्या करें महिलाएं, जानिये क्या है हिंसा करने वालों के लिए सजा और जुर्माने का प्रावधान?

घरेलू हिंसा महिलाओं के विरुद्ध एक जघन्य अपराध है क्या आप इस विषय से परिचित हैं ? अगर नहीं तो आपके लिए इसके लिए बनाया गया कानून और सजा के बारे में जानना ज़रूरी है

आज लगभग हर घर में महिलाओं के खिलाफ किसी न किसी प्रकार की घरेलू हिंसा होती रहती है पर ये सोचकर की इनके पास इसे सहन करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है या इस विषय में जागरूकता की कमी के कारण पीड़ित व्यक्ति कोई आवाज़ नहीं उठाता और जब इस तरह के अपराधों की संख्या तूल पकड़ने लगी तो यह परम आवश्यक हो गया की इसके लिए कोई न कोई कानून पारित हो। इसे देखते हुए सन 2005 में महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक कानून पास हुआ जिसे ‘ प्रोटेक्शन ऑफ़ वीमेन फ्रॉम डोमेस्टिक वयोलन्स एक्ट 2005’ के नाम से जाना जाता है यानी घरेलू हिंसा से महिलाओं का सुरक्षा अधिनियम 2005 के नाम से जाना जाता है।

इस अधिनियम के तहत धारा 3 में घरेलू हिंसा को परिभाषित किया गया है इसके अनुसार किसी भी पीड़ित व्यक्ति को किसी भी प्रकार की शारीरिक व मानसिक व लैंगिक छति पहुँचाना और जानबूझकर उसे ऐसा कम करने के लिए बाधित करना जो उसकी इक्षा के विरुद्ध हो दहेज़ के लिए या कम दहेज़ लाने के लिए ताने मारना उसके साथ मारपीट करना महिला और उसके परिवार वालों को गालिया देना इसमें 18 साल तक की उम्र के बच्चे भी पीड़ित की श्रेणी में आते हैं ! अगर कोई भी पुरुष किसी महिला के खिलाफ या बच्चे के खिलाफ उपरोक्त कोई भी अपराध करता हे उस पर किसी भी प्रकार का दबाव बनाने की कोशिश करता है या उसे किसी भी रूप से हिंसा का शिकार बनाता है उसके साथ जबरन शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करता है या कोशिश करता है उसे तो यह घरेलू हिंसा कहलाती है।

  1. इसमें पीड़ित को आर्थिक रूप से परेशान करना उसे आधार भूत जरूरतों जैसे की भोजन कपडे घर आदि से वंचित रखना भी शामिल है। उपरोक्त सभी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए अलग अलग धाराओं में पीड़ित की सुरक्षा का प्रावधान किया गया है।
  2. सेक्शन 18 में सुरक्षा आदेश का प्रावधान है जिसके अनुसार मजिस्ट्रेट उपरोक्त किसी अपराध के लिए सुरक्षा आदेश पारित करता है और एक प्रोटेक्शन अफसर नियुक्त किया जाता है।
  3. सेक्शन 19 में रेजिडेंस आर्डर के लिए अप्लाई कर सकते हैं।
  4. अगर कोई पुरुष किसी महिला को जिसके साथ वह उसी घर में एक छत के नीचे रहती है, जबरन बाहर निकालता है तो उसे आदेश दिया जा सकता है की वह उसी घर में या किसी अलग जगह उसके रहने की व्यवस्था करे।
  5. ऐसे ही सेक्शन 20 में पीड़ित की छति पहुंचने के लिए अदालत प्रतिवादी को कंपनसेशन का आदेश दे सकती है।
  6. सेक्शन 21 में कस्टडी आर्डर का प्रावधान है और इस धारा के अंतर्गत वादी या प्रतिवादी किसी के भी एप्लीकेशन पर बच्चे या बच्चों की कस्टडी उस व्यक्ति को दी जाएगी जिसमे बच्चे का हित उसकी सुरक्षा और उसका उज्जवल भविष्य निहित हो इसमें जिसके पास बच्चे की कस्टडी नहीं है उसे विसिटेशन का अधिकार प्राप्त है पर इन सबमें बच्चे का हित सर्वोपरि है।
  7. सेक्शन 23 में मेंटेनेंस या गुजारा भत्ता और एक्स पार्टी आर्डर या एक तरफा आदेश का प्रावधान है। अगर प्रतिवादी जानबूझकर अदालत की कार्यवाही में भाग नहीं लेता और अदालत को ऐसा लगता है की वादी के विरुद्ध किसी भी प्रकार की घरेलु हिंसा प्रतिवादी द्वारा की गई हे तो उपरोक्त किसी भी सेक्शन में प्रतिवादी के खिलाफ आदेश पारित हो सकता है।
  8. सेक्शन 22 में छतिपूर्ति का प्रावधान है और आदेश पारित होने के 30 दिन के अंदर जिसके विरुद्ध आदेश पारित हुआ है उसे अगर लगता है की यह आदेश गलत है तो वो सेशंस कोर्ट में अपील कर सकता है।

इस तरह इस कानून के अंतर्गत पीड़ित को कई तरह की सुरक्षा प्रदान की गई है और रोज़ कोई न कोई नया आदेश उचत्तम न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा पारित होता है जो एक नया प्रेसिडेंट बन जाता है परन्तु आज के टाइम में इस कानून का गलत इस्तेमाल भी हो रहा है जिसका इस्तेमाल महिलाये या पत्नियां पुरुषों या पति और उसके परिवार वालो को निचे दिखाने और उनसे अपनी गलत शर्ते मनवाने में लिए भी कर रही है जो की इस कानून का दुरूपयोग है। जिसकी वजह से जो सचमुच घरेलु हिंसा का शिकार है उसे न्याय नहीं मिल पता और ये पुरुषों के विरुद्ध हिंसा का रूप लेता जा रहा है हमें सचमुच इस पर विचार करने की आवस्यकता है की जो कानून महिलाओं को न्याय देने के लिए बना उसे कुछ महिलाये अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए इस्तेमाल कर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है जिससे हिंसा रुकेगी नहीं बल्कि हिंसा को बढ़ावा मिलेगा और इसी वजह से आज कोर्ट घरेलु हिंसा के मामलों से भरी पड़ी है और न्याय मिल पाना बहुत ही असंभव सा प्रतीत होता है सो तनिक फिर से सोंचिये विचारिये क्या आज समाज जिस पथ पर अग्रसर है वह कितना उचित है।

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