इतिहासकार का जादू

इतिहासकार का जादू[1]

इतिहासकार शुरू करता है.

भारी-भरकम लयबद्ध आवाज की निरंतरता
सर्वप्रथम मंचीय प्रकाश को गायब कर देती है…
धीरे धीरे इंसानी शक्ल, कद काठी नहीं रहने देती.
अनैतिहासिक अन्धकार के जाल को भेदते हुए
हमें ऐसे प्रकाश व्यवस्था में ले जाती हैं
जहां गुजरे ज़माने के सिक्के हैं
माटी के नीचे दबे पाषाण. गुफा चित्र.
वनैले अँधेरे में पेड़ की टहनी से चिपका है मानव
अस्तित्व की लड़ाई प्रतिदिन लड़ता.
भवन, भवन के कंगूरे और स्थापत्य हैं.
ताम्रपत्रीय अवशेष, स्तम्भ, स्नानागार और भित्तिचित्र.
अद्भुत भवन और पूजा स्थल.
पुराणों के पृष्ठों पर अंकित कथाओं के विश्लेषण का युद्ध है.
एक – एक खुदे अक्षर और चिन्ह की व्याख्या की लड़ाई.

शब्दों से चित्र बनने की प्रक्रिया में
हम देखते जाते हैं विशालकाय मैदान में खड़ी सेनाएं.
राजाज्ञाएं. युद्ध.

धीरे धीरे मन स्वीकारता है –
सत्य एक बहुआयामी और पेचीदा चीज है,
निष्कर्ष पर पहुँचने की जल्दबाजी ना करो.
हर निष्कर्ष और नियमन को साक्ष्य चाहिए..
हर विश्लेषण को तर्क चाहिए.
यहाँ तक कि हर भगवान् को हमारी मान्यता चाहिए.

जब हम कहते हैं राजा
तो साथ में है उसका प्रतिलोम प्रजा.
एक है आज्ञा देने वाला तो
बहुत हैं आज्ञा मानने वाले.

जब – जब राजाज्ञा न मानने वाले
एकजुट होते हैं …तब
इतिहास की एकरसता टूटती है
तब नये अध्याय जुड़ते हैं
तब नई तस्वीरें शब्दों को मजबूती देती हैं….

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[1] प्रो. इरफ़ान एस. हबीब को सुनने के बाद की शाब्दिक प्रतिक्रिया..

 

  • मनोज मल्हार
    मूलतः समस्तीपुर , बिहार से
    आलोचना, हंस, वाक्, कथादेश, अनभै सांचा, पररंदे, जनसत्ता, प्रभात खिर इत्यादद पत्र- पबत्रकाओं में कववतायेँ, लेख, समीक्षा प्रकाशित.
    वामपंथी राजनीतत में सक्रिय दहस्सेदारी.
    फिल्म एवं नाटक के निर्माण – निर्देशन में विशेष रूचि. यात्राओं का शौक़ीन.
    सम्प्रति : दिल्ली विश्वविद्यालय के कमला नेहरु कॉलेज में अध्यापन
    संपर्क : [email protected] / 8826882745 : [email protected] / 8826882745
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