हमारे सड़े-गले समाज में बलात्कार पीड़िताओं का मर जाना ही बेहतर है!

इस निर्भया का भी मर जाना ही बेहतर था, वैसे भी इस सड़े-गले समाज में बलात्कार पीड़िताओं के बारे में कौन सोचता है? और खासतौर पर अगर वो समाज के निछले तबके से और दरिंदे ऊँचे तबके से हों। बल्कि बलात्कार पीड़िताएं को समाज, सरकार और हमारी न्याय व्यवस्था ज़्यादा दुख देती है। अगर वो दरिंदगी से बच भी जाती तो एक्सीडेंट्स में मार दिया जाता, संघर्ष करते हुए उनके बाप या भाइयों को जेल में मरना पड़ता है, उनके रिश्तेदारों को समाज अपनी घटिया सोच और शब्दों के बाण से शर्मसार करता! यही तो होता आया है ना अभी तक?

यह वो देश बन गया है जहाँ समाज के डर से बलात्कारियों को नहीं बल्कि पीड़िता को अपनी पहचान छुपानी पड़ती है। जहाँ पीड़िता समाज और व्यवस्था के डर से पुलिस में कम्पलेंट नहीं कराती हैं, बल्कि पहले तो पुलिस ही FIR दर्ज नहीं करती है और अगर दर्ज भी हो जाए तो भी बरसों तक मुजरिमों को सज़ा नहीं मिलती है। इतनी पीड़ा झेलने से बेहतर तो मर जाना है!

वैसे भी हम एक मर चुके समाज में रहते हैं, जहाँ महिलाएं अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने में रुचि नहीं रखती हैं, जहाँ पुरुष ऐसे मामलों को भी चटखारे लेकर पढ़ते हैं। और जो महिलाएँ या पुरूष इस दरिंदगी की खिलाफ आवाज़ उठाते भी हैं तो वो भी सरकारों के झूठे वादों पर घर बैठ जाते हैं और जब सरकारें वादा पूरा नहीं करती हैं तो वोट देते समय उनसे सवाल करने वाला भी कोई नहीं होता, वैसे भी हमारे देश में वोट अपने मुद्दों पर नहीं बल्कि अपनी जाती, समुदाय या धर्म देखकर दिया जाता है।

इस दरिंदगी के दंश से पीछा छुटाना है तो सिर्फ कैमरों के आगे प्रदर्शन करने भर से कुछ नहीं होगा, बल्कि सरकार को हल निकालने के लिए विवश करना होगा। बलात्कार के हर केस की सुनवाई फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट में होनी चाहिये और जुर्म साबित होने पर फ़ौरन सज़ा मिलनी चाहिए, दूसरा कोई रास्ता नज़र नहीं आता है।

Show More

Shahnawz 'Sahil'

पत्रकारिता से करियर शुरुआत की, विज्ञापन एवं डिज़ाइन के क्षेत्र में कार्यरत तथा ग़ालिब के शहर दिल्ली में रहता हूँ...

Related Articles

Back to top button