महामारी में भी नफरत फैलाने की साज़िशें चरम पर

कोरोना महामारी ने ज़िन्दगी जीने की हमारे तरीके को बदल कर रख दिया है। स्कूली बच्चों से लेकर 60-70 साल की उम्र के लोगों पर पर भी इसका असर काफी गहरा पड़ा है। विशेषकर ब्लड प्रेशर, शुगर या हार्ट के मरीज़ों पर कोरोना का प्रभाव अधिक देखा जा रहा है। अगर हम थोड़ी भी रिसर्च करें तो पता चलता है कि कोरोना जैसी महामारी सदी में एक बार जरूर आती है। पिछले दशक में प्लेग आया है जो मुम्बई से शुरू हुआ था पानी के जहाज से भारत में आया था।

कोरोना वायरस अधिकतर कालेधन की संतानें, बड़े सियासतदानों, बड़े नौकरशाहों, व्यापारी घरानों व बड़े डॉक्टर्स की संतानें हवाई यात्रा के दौरान, जनवरी, फरवरी 2020 में लेकर आइऔ मुम्बई, दिल्ली, चेन्नई, अहमदाबाद के हवाई अड्डों से ये चलकर आई थीं। जहां से पूरे देश भर में ये फैले देश के 750 सांसदों में से 500 सांसदों व 8 हजार विधायकों व 200 बड़े नौकरशाहों के बाल बच्चों जो विदेशों में इंग्लैण्ड, अमेरिका, इटली, चायना व सोवियत रूस आदि में पढ़ते थे वो कोरोना के ज्यादातर वाहक बने। उनकी न तो जाँचें हुइऔ न उनके ऊपर हवाई अड्डों में कोई जाँचें ही की जा सकी थीं। ये सब प्रभावशाली व कानून को जेबों में रखने वाले माने जाते हैं।

योरोप के देशों व उसके शहरों में 4 माह के लॉकडाउन के बाद सड़कों का नजारा रातों रात बदल गया। कारों की अहमियत यहाँ कम करके उन पर बैरियर लगाये जा चुके हैं और सायकल ट्रैक तेजी से बनाये जा चुके हैं। वैसे तो शुरू से ही योरोप के आम व खास लोग 4 से 10 किलोमीटर तक सायकल चलाने के आदी हो चुके हैं। वहां बड़ी से बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिकों से लेकर उनके एम.डी. व अन्य आला अफसरान आम तौर से पिछले 20 वर्ष़ों से अपने दतरों में सायकल से आते जाते देखे जा रहे थे। उनमें से 50 फीसद लोगों का इजाफा और भी कोरोना काल में हो जाना अच्छी बात है। पर भारत में इस तरफ ध्यान काफी कम जाता देखा गया है। यहां सायकल की सवारी को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ा जाना चाहिये जो यहां के आलसी व गैर संवेदनशील सियासतदां ने नहीं किया। सिर्फ नारों, वादों व झूठी शान से आवाम को गुमराह करके रखा जा रहा है। चुनावी वादे भारत में 90 फीसद तक पूरे ही नहीं किये जाते रहे हैं फिर भी बेरोजगारी के नाम पर महंगाई के नाम पर मंदिर मस्जिदों के नामों पर हिन्दू मुस्लिमों के नामों पर वोट लेकर कुर्सियां पा ली जाती हैं और फिर आम जनता को ठग लिया जाता है। एम.एल.ए. खरीद कर सरकारें बना ली जाती हैं। सरकारी जमीनें हड़प कर समाजसेवी बनने का ढोंग रख जाता है। सियासत के दम पर पुलिस व गुण्डों के दम पर कुर्सियां पा ली जाती हैं।
आल प्रेस इंडिया के नाम पर साम्प्रदायिकता

कोरोना काल में जहाँ 90 लाख लोगों की नौकरियाँ जा चुकी हैं 50 लाख लोगों की जाने वाली हैं और सत्ता दल अपनी साम्प्रदायक देश को बाँटने की विचारधारा को लागू करने में व्हाट्सएप, इंटरनेट के माध्यम से हिन्दू मुस्लिमों में नफरत फैलाने से बाज नहीं आ रहा है। ग्वालियर के एक ऑल प्रेस इंडिया नाम के व्हाट्सएप ग्रुप के लोग कुछ स्थानीय पाण्डे व पाठक पत्रकारों के सहयोग से नफरतें का व्यापार कर रहे हैं। कोई ए.के. सोनी 9993712941 नम्बर से नफरतों को बढ़ाकर भारत को भी लैबनान व सीरिया बनाने पर आमादा है। प्रशासन मूकदर्शक बना है। ये सब संघ परिवार से जुड़े लोग बताये जा रहे हैं।

कांग्रेसी वामपंथियों के कमजोर पड़ जाने से संघ परिवार के लोग देश में अपना ऐजेंडा लागू करने में कोरोना जैसी भीषण बीमारी में भी रहम नहीं करना चाहते हैं। वो तो सिर्फ गरीबों, दलितों व मुसलमानों से दुश्मनी निकालने का हर पल बहाना खोजते रहते हैं। पुलिस मेहकमे के सायबर सैल के लोग सोये हुए हैं। क्या इस पर प्रश्न चिन्ह शहर के जागरूक लोग कर रहे हैं। बात इस कोरोना काल में सद्भाव शांति बनाने व एकता बनाए रखने की है पर आल प्रेस इंडिया वाट्सएप के नाम पर नफरतों के व्यापारी सक्रिय हैं। ये हैरत व शोक की बात है। ऐसे देशद्रोहियों पर लगाम लगनी चाहिए। इन पर मामले दर्ज हों, इन्हें बेनकाब किया जाये वरना सायबर सैल का कोई मायने को जनता क्या समझेगी।

  • नईम कुरेशी

 

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