जेब है खाली, कैसे मनाएं छठ और दिवाली?

  1. देश में आर्थिक मंदी का सबसे कठिन दौर चल रहा है, ऊपर से कोरोना के लॉक डाउन ने लोगों की कमर तोड़ है. बेरोज़गारी चरम पर है, देश की जनता मोरेटोरियम लेने के कारण बढे बैंकों के ब्याज तक को नहीं चुका पा रहे हैं। और ऐसे समय में देश में त्योहारों का सीज़न चल रहा है, देश में मनाए जाने वाला सबसे बड़ा व सबसे बड़ा त्यौहार दीपावली का दिन भी एकदम करीब आ चुका है, 14 नवम्बर में बस एक सप्ताह का ही समय बचा है। दीपावली की गिनती उन त्योहारों में होती है जो देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में मददगार होते है। दीपावली के बाद ही यानि 18 व 19 नवंबर को छठ का त्यौहार भी मनाया जा रहा है।

वैसे तो छठ खासतौर पर बिहार का पर्व समझा जाता है। परन्तु जैसे जैसे बिहार के कामगारों व मेहनतकश लोगों ने रोज़गार के मक़सद से देश के कोने कोने में रहना व बसना शुरू किया तब से छठ भी धीरे धीरे अन्य त्योहारों की ही तरह राष्ट्रीय त्यौहार बनता जा रहा है। अब छठ का नज़ारा बिहार ही नहीं देश के सभी बड़े महानगरों, यहाँ तक कि समुद्र तट पर भी देखा जा सकता है। दिल्ली से लेकर हरियाणा, पंजाब जैसे राज्यों में भी छठ पूजा पूरे धूम और श्रद्धा के साथ की जाने लगी है।

पर पहले की मुकाबले में इस बार की दिवाली, धनतेरस और छठ पूजा जैसे त्योहारों पर भारत के लोगों में ख़ुशी और उत्साह नज़र नहीं आ है। वजह साफ़ है, एक तो कोरोना काल और दुसरा देश में पैर पसार चुकी आर्थिक मंदी। उस पर सोने पे सुहागा यह कि देश इस समय मंहगाई के उस मुश्किल दौर से गुज़र रहा है जिसकी कल्पना भी शायद देशवासियों ने कभी नहीं की होगी। आलू जैसी सब्ज़ी जो जिसके बिना  अमीरों से लेकर ग़रीबों तक की थाली की कल्पना करना  है, उसकी कीमत भी 50 रूपये किलो के ऊपर जा चुकी है। वहीँ प्याज़, जिसके बिना ना शाकाहारी खाना बन पाता है और ना ही मांसाहारी, वह भी पिछले दिनों सौ रूपये किलो तक बिक चुकी।

याद कीजिये 2014 के पहले के वह सीन जब आज के सत्ताधारी आलू- प्याज़ और पेट्रोल डीज़ल जैसी ज़रूरत की चीज़ों के दाम बढ़ने पर अपने गले में सब्ज़ियों की माला डालकर, आधे कपड़ों में ऐसे प्रदर्शन करते थे गोया इनसे बड़ा जन समर्थक कोई और हो ही नहीं सकता हो, जबकि आज रोज़  के इस्तेमाल की लगभग सभी ज़रूरी चीज़ों की क़ीमतें आसमान छू रही हैं, पर आज विपक्ष भी जनता के मुद्दों को नहीं उठा पा रहा है।

जिस बिहार राज्य के लाखों लोग लॉक डाउन के समय सैकड़ो मील पैदल चलकर बदहाली की हालत में अपने घरों को पहुंचे वही राज्य कोरोनाकाल में होने वाले पहले आम चुनाव का सामना कर  रहा है। भयंकर बेरोज़गारी व आर्थिक बदहाली वाले इस राज्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित पक्ष-विपक्ष के नेता भाषण दे रहे हैं, मोदी जी उन्हें छठ तक मुफ्त राशन देने की बात कर रही है,  ऐसे में यह सोचने का विषय है कि जिनके पास खाने को राशन न हो वह छठ और दीपावली कैसे मनाएगा?

छठ में तो फलों व सब्ज़ियों की पूजा होती है। न तो सरकार फल सब्ज़ी उपलब्ध करा पाएगी न ही इनकी क़ीमतें आम लोगों की पहुँच में हैं। दिवाली भी पकवान और मिठाई, नए कपडे, सोना, चांदी, बर्तन आदि ख़रीदने का त्यौहार है। इनमें से कोई भी चीज़ न तो सरकार मुफ़्त दे रही है न ही जनता इसे ख़रीदने की स्थिति में है। यदि प्रधानमंत्री की ही मानें तो छठ के बाद जब मुफ़्त राशन मिलना बंद हो जाएगा जोकि पक्के तौर पर  चुनावों की वजह से ही बांटा गया है, तो डर इस बात का भी है कि कहीं चुनावों के बाद ग़रीबों के भूखे मरने की ही नौबत ना जाए.

देशवासी खासतौर पर युवाओं के चेहरों पर उदासी, नाउम्मीदी व अनिश्चितता की लकीरें साफ़ तौर पर देखी जा सकती हैं। देश के लोग पूछ रहे हैं कि अगर जेब हो ख़ाली, तो कैसी दीवाली, कैसा छठ? आज के समय पर दुष्यंत कुमार की यह पंक्तियाँ पूरी तरह सटीक बैठ रही हैं – कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए। कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए!

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