किसान आंदोलन से निपटने के लिए सरकार ने बनाया “शाहीन बाग़ मॉडल”

3 कृषि कानूनों पर जारी किसान आंदोलन पर, सरकार ने किसानों के साथ कोई भी बात न करने का फैसला लिया है। अब इस आंदोलन से निपटने के लिए सरकार शाहीन बाग़ मॉडल का सहारा लेगी

देश में जारी किसान आंदोलन को लेकर अब सरकार की तरफ से प्रतिक्रिया आनी लगभग बंद ही हो गयी है। सरकार यह ज़ाहिर कर चुकी है की अब 3 कृषि कानूनों को लेकर किसान नेताओं से कोई बातचीत नहीं होगी। अगर किसानों ने सरकार द्वारा दिए गए प्रस्ताव को नहीं माना तो सरकार भी सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले का ही इंतज़ार करेगी। वहीँ दूसरी ओर किसान भी अपनी कानून वापसी की मांग पर अड़े हुए हैं। जिसके चलते वो दिल्ली के तमाम बॉर्डर्स पर अपने दिन गुज़ार रहे हैं।

सरकार ने सिंघु बॉर्डर, टिकरी बॉर्डर समेत कई प्रादेशिक सीमाओं पर बैरिकैड, बाड़ और कील लगवा दिए हैं ताकि कोई भी दिल्ली के अंदर प्रवेश न कर पाए। बता दें की सरकार ने अब शाहीन बाग़ की तर्ज़ पर आंदोलनकारियों से निपटने की योजना बनायीं है। क्योंकि किसान अपनी मांग पर अड़े हुए है और सरकार ने भी किसानों से कोई बातचीत न करने का ऐलान कर दिया है ऐसे में, कोई हिंसा न हो इसलिए सरकार ने सभी आंदोलनस्थलों को पूरी तरह से पैक करने की योजना बनायी है। शाहीन बाग़ में भी ऐसी ही रणनीति बनायीं गयी थी, आंदोलनस्थलों को चारों ओर से घेर लिया गया था और अब किसान आंदोलन में किसी भी घटना को रोकने के लिए सरकार ने यह रुख अपनाया है।

अभी तक किसान नेताओं और सरकार के बीच 12 दौर की बैठक हो चुकी है लेकिन किसानों ने सरकार का प्रस्ताव हर बैठक में ठुकराया है जिस प्रस्ताव में किसानों की मांग को पूरा करने का ज़िक्र नहीं था। इसलिए सरकार ने भी अब यह ठान ली है की किसानों को उनकी मांग पर अड़े रहने दिया जाए वो इन कानूनों को देश में लागू करने के लिए लम्बी लड़ाई लड़ेंगे। यानी अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतज़ार किसान भी करेगा और सरकार भी।

बता दें की 3 कृषि कानूनों के विरोध में किसानों की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने 3 सदस्यों की एक समिति तैयार की थी, जो इस पूरे मुद्दे को खंगाल कर अपना फैसला अगले महीने देगी। सरकार का कहना है की अब वो किसान नेताओं से कोई बात नहीं करेंगे बल्कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनायीं गयी समिति के अंतिम फैसले का इंतज़ार करेंगे। हालांकि सरकार ने अभी भी किसानों से अपील की है की वो सरकार के पुराने प्रस्ताव पर सहमति जता दें लेकिन किसान अपनी मांग पर अड़े हुए हैं। ऐसे में अब अगर सरकार और किसान दोनो ही सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतज़ार करेंगे तो देश की जनता को भी इंतज़ार ही करना पड़ेगा। भारी तादाद में एक भाग किसान आंदोलन के समर्थन में है तो एक भाग 3 कृषि कानूनों के समर्थन में है। इसलिए सरकार, किसान और जनता के इन दो भागों के धैर्य के इम्तिहान की घडी आ चुकी है।

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