पूरी ट्रैक्टर रैली का पूरा खुलासा, किसान थे वाकिफ या सरकार की थी चाल ?

ट्रेक्टर रैली में हुई हिंसक झड़प के बाद किसान नेताओं ने वापसी का रुख अपना लिया है, लेकिन ट्रेक्टर रैली की शुरुआत हुई कैसे ? पढ़िए ये रिपोर्ट

ट्रैक्टर रैली में हुई हिंसक झड़प के बाद किसान आंदोलन की ज़मीन कुछ हद तक कमज़ोर होती दिखाई पड़ रही है। आंदोलन में शामिल दो संगठनों ने किसान आंदोलन से वापसी का फैसला ले लिया है। राष्ट्रीय किसान मज़दूर संगठन और भारतीय किसान यूनियन ने गाज़ीपुर और नोएडा बॉर्डर पर चल रहे प्रदर्शन को वापस ले लिया है जिसके बाद आशंका ये जताई जा रही है कि कहीं इससे किसान आंदोलन की जड़ें कमज़ोर तो नहीं हो गयी हैं और क्या अब इस हालात में ये ज़्यादा दिन तक चल पाएगा भी या नहीं। आखिर पिछले दिनों ट्रैक्टर रैली और उससे जुडी घटनाओं में क्या कुछ हुआ, उसके बारे में पूरा सच जानना भी ज़रूरी है। देश में इस बार 26 जनवरी की चर्चा तो थी ही साथ ही ट्रैक्टर रैली की गूंज भी पूरे देशभर में फैल गई थी! लेकिन इस बात का अंदाज़ा शायद ही किसी को होगा कि गणतंत्र दिवस के मौके पर देश का मिजाज़ इस कदर बिगड़ जाएगा या फिर बिगाड़ दिया जाएगा!

ट्रैक्टर रैली की शुरुआत, दो महीने से जारी किसान आंदोलन से हुई! किसान आंदोलन में 11 दौर की बैठक के बाद भी जब कोई समाधान निकलकर नहीं आया तो किसानों ने राजधानी दिल्ली में परेड के साथ ही ट्रैक्टर रैली भी निकालने का ऐलान कर दिया! यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया जहाँ कोर्ट ने इस मामले पर अपने संज्ञान से इंकार कर दिया और  ट्रैक्टर रैली का  फैसला पुलिस पर छोड़ दिया! किसानों ने यहाँ भी हार नहीं मानी और पुलिस से ट्रैक्टर रैली निकालने पर इजाज़त मांग ली! यहाँ तक सब बेहतर था! 26 जनवरी के दिन भी शुरुआत में किसानों ने शांतिपूर्ण तरीके से मान्य रास्तों से ट्रैक्टर रैली निकाली लेकिन कुछ ही समय बाद यह रैली एक हिंसक झड़प में तब्दील हो गई !

बताया ऐसा गया कि ट्रैक्टर रैली के लिए जो रूट्स पुलिस ने निर्धारित किये थे वहाँ किसानों के ट्रैक्टर्स को रोकने के लिए बैरिकेटिंग लगा दिए गये थे जिस वजह से किसानों ने वो बैरिकेटिंग तोड़े और लालकिले की तरफ कूच कर गये! मामला तब बिगड़ा जब किसानों की इस ट्रैक्टर रैली में भारी संख्या में मौजूद उपद्रवी लाल किले पर इकट्ठे हो गए और उनमें से एक ने लाल किले की प्राचीर पर जाकर निशान साहिब का झंडा फहरा दिया! पूरे देश में इस घटना के बाद ही किसान आंदोलन पर काफी सवाल उठने शुरु हो गये हैं! क्योंकि यहाँ कुछ उपद्रवियों की वजह से किसान आंदोलन का मज़ाक तो बना ही पर साथ ही लालकिले पर लहरा रहे तिरंगे का भी अपमान किया गया! लेकिन सवाल ये है कि 26 जनवरी, गणतंत्र दिवस के दिन इतनी कड़े सुरक्षा इंतज़ाम के बावजूद ये उपद्रवी लालकिले के अंदर पहुंचे कैसे? किसान नेताओं का कहना है कि उन्हें इस हिंसक झड़प के बारे में कोई अंदाज़ा ही नहीं था और ना ही कोई खबर थी लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यह उपद्रवी ट्रैक्टर रैली में शामिल किसान नहीं थे! पर ये जो भी थे, सवाल यही है कि  सरकार से इतनी बड़ी लापरवाही हुई कैसे? इन लोगों को लालकिले में घुसने कैसे दिया गया?

हालांकि पुलिस ने इस पूरी हिंसक झड़प में करीब 200 लोगों को गिरफ्तार किया है! वहीं मशहूर एक्टिविस्ट और गैंगस्टर लक्खा सिधाना पर पुलिस की नज़रे टिकी हुई है! लक्खा पर अपहरण, लूट, फिरौती जैसे अपराधों को लेकर केस दर्ज है! हालांकि लक्खा के खिलाफ कोई सुबूत ना मिलने की वजह से उन्हें बरी कर दिया गया  है! यही नहीं अब तो लालकिले पर निशान साहिब का झंडा फहराने वाले शख्स के नाम का भी खुलासा हो गया है! जिनका नाम जुगराज सिंह बताया जा रहा है! इस पूरी झड़प पर कई नेताओं के बयान भी सामने आए किसी ने किसानों की इस ट्रैक्टर रैली पर सवाल उठाए तो किसीने इसका समर्थन किया! पर घूम फिर कर सवाल केंद्र पर ही उठ रहा है कि आखिर इतनी बड़ी घटना को अंजाम दिया कैसे गया? जब सरकार को ट्रैक्टर रैली के बारे में पूरी जानकारी थी तो फिर सुरक्षा के मद्देनजर व्यवस्था क्यों नहीं की गई? क्या सरकार पहले से ये जानती थी कि ऐसी अराजकता फैलाई जा सकती है और अगर जानती थी, तो पता होने के बावजूद हिंसक झड़प होना क्या कोई साजिश थी?

क्योंकि सरकार ने सुरक्षा सैन्यबल की टुकड़ियों में संख्या बढ़ा दी है जिससे यह साफ होता दिख रहा है कि कहीं ना कहीं इस घटना को होने दिया गया ताकि किसान आंदोलन की जड़ों को कमज़ोर किया जा सके! हालांकि किसान आंदोलन में संगठनों की वापसी से यह मामला अब और गंभीर हो गया है जिस से किसान नेताओं पर भी सवाल उठने शुरू हो गए हैं। आम जनता में किसानों और किसान आंदोलन को लेकर जो भावनाएं थी, जो जुड़ाव था, उसे खत्म करने की योजना बनाई गई! अब देखना यही है की ट्रैक्टर रैली के नाम पर रची गई साज़िश का खुलासा कितनी जल्द होता है? क्योंकि अगर इसमें सरकार का ही कोई योगदान नज़र आया तो एक बार फिर सरकार सवालों के कटघरे में खड़ी हो जाएगी! लेकिन फ़िलहाल तो किसान नेताओं पर सवालों की सुई अटक गयी है।

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