किसानों का दिल्ली और सरकार का हैदराबाद कूच

2014 में मुल्क के कुल 17.16 करोड़ लोगों ने भाजपा को देश का संचालन करने के लिए चुना था, तकरीबन 42.63 प्रतिशत मत भाजपा को मिला था 2014 के कुछ आंकड़ों के मुताबिक किसानो ने भाजपा को एकमुश्त वोट दिया था। किन वादों के तहत किसानों ने भाजपा का चयन किया था, मुमकिन है कि यह किसानों को भी याद न हो।

 2014 में भाजपा ने एक नारा बहुत जोर शोर से लगाया था 6 साल बाद उसके पोस्टर सोशल मीडिया पे दौड़ रहे हैं नारा कुछ यूँ था “बहुत हुआ किसान पर अत्याचार- अबकी बार मोदी सरकार” शायद इसी नारे ने किसानो को भाजपा के समर्थन में एकत्रित कर दिया था। 2014 में भाजपा ने अपने घोषणापत्र में किसानों के लिए  काफी वादे किए थे हालांकि मोदी सरकार अपने 5 साल के कार्यकाल में कोई ऐसा वादा पूरा नही कर पाई जो उल्लेखनीय हो। यह ज़रूर हुआ कि सरकार जमीन अधिकग्रहण कानून में बदलाव लेकर आई, जिसे किसानों के विरुद्ध माना जा रहा था पर विपक्ष के सख्त विरोध के चलते सरकार को अपने क़दम पीछे खींचने पड़े थे। हालांकि इसके अलावा कोई और ऐसा फैसला नहीं आया जो किसानो को हुकूमत के खिलाफ खड़ा करने के लिए मजबूर करता, शायद यही वजह थी कि 2019 के लोकसभा चुनाव में किसान दोबारा मोदी सरकार के पक्ष में नज़र आए। बल्कि कहा यह भी जाता है कि 2014 के मुक़ाबले 2019 में किसानो का मोदी सरकार के समर्थन में इज़ाफ़ा हो गया। मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण कानून की मंशा का किसानों की तरफ से विरोध किया जा सकता था, सड़क पकड़ी जा सकती थी मगर सरकार के यू टर्न से  बात आंदोलन और विरोध तक नही पहुंच सकी थी।

सरकार का दूसरा कार्यकाल विवादित फैसले लेने के लिए याद किया जाऐगा। शुरुआत तीन तलाक से हुई जिसे समुदाय विशेष के खिलाफ माना गया। विरोध भी उन्होंने ही करना था और सड़क पर भी वही उतरे। उसके बाद मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाली 370 को ख़त्म करने का फ़ैसला किया। इसमें विरोध होना था लेकिन जिन को करना था उन्हें सरकार ने घरों में क़ैद कर दिया था। इसके बाद सरकार नागरिकता संशोधन बिल लेकर आई, जिसका पूरे देश में विरोध हुआ आज़ादी के बाद किसी हुकूमत के खिलाफ यह सबसे बड़ा विरोध आंदोलन माना जाता है, जिसकी चर्चा विदेशी में भी खूब हुई। 

इसके बाद भी मोदी सरकार थमी नही, और कृषि पर 3 कानून ले आई। इन कृषि कानूनों का वह किसान विरोध कर रहे हैं, जो भाजपा का मज़बूत मतदाता कहलाने लगा था। पंजाब, हरियाणा ही नही हर राज्य से किसान दिल्ली पहुंच रहे हैं सरकार से बात करना चाहते हैं उसके सामने अपना पक्ष रखना चाहते हैं, लेकिन सरकार पुलिस को आगे कर निगम चुनाव में हैदराबाद कूच कर गई है। किसानों का आंदोलन लगातार जारी है, हुकूमत उनको रोकने के तमाम हथकंडे अपना रही है। वक़्त वक़्त पे पुलिस उनके साथ बल का प्रयोग भी कर रही है। भाजपा से जुड़े लोग इस आंदोलन को कभी विपक्ष द्वारा प्रायोजित बता रहे हैं तो कभी उसे खालिस्तान से जोड़कर दिशाहीन करने की कोशिश कर रहे हैं। 

भाजपा के नेता कह रहे हैं आंदोलन में भीड़ की तादाद ज़ायदा है कोरोना इंफेक्शन बढ़ने का खतरा है। लेकिन भूल जाते है कि उनके दिग्गज नेता हैदराबाद में बड़ी बड़ी रैलियां कर रहे हैं। इससे पहले बिहार की चुनावी रैलियों का भी यही नज़ारा रह चुका है। 

किसान मीडिया से बातचीत में कह रहे हैं कि सरकार कृषि कानून बिल जब तक वापस नहीं लेगी आंदोलन चलता रहेगा ये आंदोलन कब ख़त्म होगा इसका वक्त तय नहीं है, हमारे पास 6 महीने का राशन उपलब्ध है इससे पहले हुकूमत के खिलाफ जो आंदोलन चल रहा था उस पर लॉक डाउन के चलते विराम लगा था, जो सरकार के लिए राहत की बात थी और अभी फिर से लॉक डाउन की चर्चा तेज़ है। आगे क्या होना है यह तो भविष्य की गर्त में छुपा हुआ है, देखते हैं कि अगर बातचीत होती है तो सरकार अपनी बात मनवाने में कामयाब होती है या किसानो की बातें मानी जाएगी।

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  • इस रिपोर्ट में आवाज़ मेरी है और आपके लिए इसे लिखा है मेरे सहयोगी अम्मार अंसारी ने।
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Shahnawz 'Sahil'

पत्रकारिता से करियर शुरुआत की, विज्ञापन एवं डिज़ाइन के क्षेत्र में कार्यरत तथा ग़ालिब के शहर दिल्ली में रहता हूँ...

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