कोरोना पर सरकार और मीडिया का दोगलापन

देश की हुकूमत कोरोना को लेकर फिर सतर्क हो गयी है कहा जा रहा है कोरोना का कहर बढ़ रहा है, साथ ही भारतीय मीडिया भी इसी तरह का दावा कर रहा है। प्रिंट मीडिया भी पिछले कुछ दिनों से कोरोना को लेकर बड़ी बड़ी खबरें लगा रहा है। अख़बार का मुख्या पेज कोरोना के आंकड़े बता रहा है ,सक्रिय मरीज की तादाद, मृत्यु दर और वैक्सीन का भी ज़िक्र किया जा रहा है। इलेक्ट्रानिक मीडिया भी जैसे कोरोना से संक्रमित हो गया हो। कोरोना की उसकी कवरेज लोगों में जागरूक्ता लाने से ज्यादा डर पैदा करने की वजह हो सकती है… और इससे मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं।

हालांकि कुछ दिनों पहले तक भारतीय मीडिया त्यौहारों की रौनक, चुनावी जनसभाएं, सर्वे, चुनावी नतीजे और सुशांत को इंसाफ दिलने में व्यस्त था। हुकूमत भी कोरोना का ज़िक्र नहीं कर रही थी लेकिन बिहार और मध्यप्रदेश में कोरोना की वैक्सीन का राजनीतिक वितरण ज़रूर कर रही थी। बिहार और मध्यप्रदेश में जब चुनाव चल रहे थे तब हुकूमत, मीडिया और राजनीतिक दलों को कोरोना को लेकर कोई चिंता नहीं थी। राजनीतिक दल बड़ी बड़ी चुनावी जमसभाएं कर रहे थे, रैलियां निकाली जा रही थी, प्रधानमंत्री खुद पचास-पचास हज़ार की भीड़ को संबोधित कर रहे थे और अब मास्क पहने की और सोशल डिस्टेंसिंग रखने की हिदायत दे रहें हैं! 

मीडिया 200 300 लोगो को इकठा कर चुनावी चकल्लस में मग्न था। वही मीडिया अब कोरोना से बचने के उपाय बता रहा है । मीडिया जिस तरह से कोरोना को लेकर लोगों को सतर्क कर रहा है क्या उसे डराना भी कहा जा सकता है? राज्य सरकारें रात में लोगो को घरों में क़ैद कर रही है। देश के अधिकतर इलाक़ो में रात का कर्फ्यू लगाया जा रहा है, कर्फ्यू की टाईमिंग को लेकर सोशल मीडिया पर सवालों की बाढ़ आई हुई है, पूछा जा रहा है क्या कोरोना रात में ही सक्रिय रहता है? ऐसे बहुत से सवाल है जो पूछे जाना चाहिए लेकिन हुकूमत से सवाल करने वाले अब कम हो रहे हैं और सरकार को भी सवालों से खुशी नही होती।

यह आशंका भी लोगों के ज़हनों में घर किए हुए है कि कभी भी लॉक डाउन का एलान किया जा सकता है। शायद उनका यह डर जायज़ भी हो, प्रधामंत्री ऐसा पहले कर चुके हैं। हालांकि भारत इकलौता देश नहीं है जो कर्फ्यू लगा रहा है यूरोप के 7 देश में भी ऐसा हो रहा है लेकिन वहां कर्फ्यू लगाने से पहले रणनीति बना ली जाती है, लोगो की ज़रूरतों का ध्यान रखा जाता है। इसके बावजूद लंदन में लॉक डाउन का विरोध हो रहा है, लोग सड़कों पे उतर आए हैं। ब्रिटेन की सरकार लॉक डाउन ख़त्म करने पे विचार कर रही है। लेकिन हमारी सरकार को ये आसानी हासिल है, क्योंकि देश के लोगों में हुकूमत से सवाल करने की आदत पीछे छूट रही है, विरोध करने का तो सवाल ही नही उठता। यही वजह है कि सरकार के अप्रिय फैसले भी लोगों को कबूल करने में कोई हिचकिचाहट नही होती। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने सम्बोधन में लॉक डाउन का ज़िक्र नहीं किया, वैक्सीन की बात की। परंतु यह नहीं बताया कि यह कब आएगी और कीमत भी नहीं। हालांकि मुझे लगता है कि कोरोना को लेकर जो डर लोगो के दिमाग में बोया गया है, उसे देखते हुए लोग वैक्सीन किसी भी कीमत पर खरीदने के लिए खुद को विवश पाएंगे। 

पिछले लॉक डाउन में प्रवासी मजदूर पैदल सफर कर अपने घरों पर पहुंचे थे, शायद उनके ज़ख़्म भर गए होंगे? लेकिन निशान ज़रूर बाकी होंगे, जिस्म ना भी सही पर मन मस्तिष्क अभी भी छलनी होगा।

इस मौज़ू पर फ़ैसल सईद ज़िरग़ाम साहब का एक शेर याद आ रहा है 

कहा फ़लक ने ये उड़ते हुए परिंदों से
ज़मीं पे लोग मकानों में क़ैद रहते हैं

  • अम्मार अंसारी द्वारा आपके लिए लिखी इस रिपोर्ट के साथ आपके ज़हनों में कुछ सवाल छोड़कर जा रहा हूँ, कुछ समझ में नहीं आए तो कमेंट के माध्यम से पूछ लीजिएगा।

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Shahnawz 'Sahil'

पत्रकारिता से करियर शुरुआत की, विज्ञापन एवं डिज़ाइन के क्षेत्र में कार्यरत तथा ग़ालिब के शहर दिल्ली में रहता हूँ...

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