‘डॉमनिक की वापसी’ – आधुनिक समाज में खोए हुए प्रेम की वापसी की तलाश

समीक्षा डॉमनिक की वापसी” ( उपन्यास ),
लेखक – विवके मिश्र;
प्रकाशकः किताब घर प्रकाशन,
4855 – 56/24, अंसारी रोड़, दरियागंज, नयी दिल्ली – 110002, प्रथम संस्करणः 16 दिसम्बर- 2015, पृष्ठ-208; मूल्य 350 रुपये मात्र।
ISBN: 978-93-822114- 69-7

इधर के दिनों में कथाकार विवेक मिश्र का उपन्यास ‘डॉमनिक की वापसी’ पढ़ने का अवसर मिला। उनकी प्रतिभा और समकालीन वैचारिकी का जीवन्त दस्तावेज है यह उपन्यास। साथ ही समाज में जन्म लेती नई विसंगतियों में घटते प्रेम की तलाश और इसकी चिन्ता को प्रकट करता हुआ यह आज के समय का जीवन्त इतिहास भी है।

इस उपन्यास के माध्यम से उपन्यासकार समाज में प्रेम की वापसी करना चाहता है; वह चाहता है कि मानव, मानव के बीच प्रेम बढ़े और प्रेम की स्थापना हो। लेकिन समकालीन जीवन इतना सरल नही है कि प्रेम को मानव जीवन के आस-पास रहन दे। प्रेम के टूटते और बार-बार पनपते जीवन की कथा है, ‘डॉमनिक की वापसी।

समाज में अनेक तरह की चतुराइयाँ हैं, छल-छद्म हैं, इन सभी भावनाओं के बीच प्रेम का पौधा उत्तर आधुनिक समाज में ‘मर सा’ गया है, और इसका कारण है मानव की लगातार बढ़ती महत्वाकांक्षा। इस महत्वाकांक्षा ने अन्य चींजो में तो  बढ़ोत्तरी कर दी  है, लेकिन हमारे सपनों मे अब प्रेम नही रह गया है, रह गया है तो ’ प्रेम का नाटक’। कुछ लोग यह तलाशने या सिद्ध करने में लगे हैं कि कला- कला के लिए है, इसके विरूद्ध यह उपन्यास कहता है कला जीवन के लिए है, वह सिद्ध करता है, जीवन से अलग कुछ भी नही है। और वह कला के माध्यम से समाज में प्रेम की स्थापना करना चाहता है। उपन्यास जिस माध्यम से हमारे सामने आता है; वह ‘नाटक’ की प्रक्रिया है, एक नाटक मंडली की ‘आत्म-सम्बद्धता’ है लेकिन इस आत्मसम्बद्धता में सभी एक दूसरे से टकराते हैं, केवल अपना हितसाधन करना चाहते हैं; जो उपन्यास का कथा मंच है वही जीवन का मंच भी है, जीवन को लोग नाटक की तरह जीते हैं, इस उपन्यास के पात्र भी लगभग ऐसा ही करते  दिखाई देते हैं।

डॉमनिक की वापसी’ दरअसल उत्तर आधुनिक सामाजिक सांस्कृतिक महा-पीड़ा से उपजा हुआ आख्यान है, जो सीधे तौर पर हमें अपना हिस्सा बना लेता है, और पाठक यह मान लेता है कि वह इसी औपचारिक दुनिया का एक पात्र है। और उसे लगने लगता है कि दीपांश उसका मित्र ही है, और उसकी पीड़ा उसकी जीवन प्रक्रिया, जीवनगति उसकी अपनी ही है, वह उसका साथी है।

इस दुनिया में पहला प्रेम लगभग ही सभी का टूट जाता है, खो जाता है, इसके अनेक कारण हैं, जिनमें जाति, धर्म, पैसा प्रमुख हैं; यदि पैसा हो तो ये सब बातें छुपाई भी जा सकती है; लेकिन इन सब पर भारी पड़ जाता है – ’वर्ण’ और वर्ण की शु़द्धता का भाव। किसी के ‘प्रेम’ के ‘भाव’ को सही नहीं ठहराता है; भले मानव की दो ही कोटियाँ हों लेकिन इन कोटियों में- मात्र -‘स्त्री-पुरुष’ नहीं हैं; है और भी बहुत कुछ और इस बहुत कुछ में हमारा प्रेम दबता  जाता है, लोग जिसे  सबसे  ज्यादा दबाते हैं, वह है प्रेम और इस उपन्यास का नायक उसी प्रेम को बार-बार तलाश करता है।

‘‘यहाँ सवाल गरीबी, बेरोजगारी या भ्रष्टाचार का नही था। सवाल जाति धर्म या देश में बदलती राजनीति का भी नहीं था। यहाँ सवाल था प्रेम का , प्रेम के अधिकार का, पर यहां जैसे उसका हर सोता सूख गया था।‘‘ ( ‘डॉमनिक की वापसी’ , पृष्ठ-11) लेखक का पूरा प्रयास है कि वह समाज में प्रेम के इस सूख चुके ‘सोते’ को प्रेम के पानी से पल्लवित पुष्पित कर दे, और इसी की यात्रा है यह उपन्यास , और इसी की यात्रा  है, दीपांश का पूरा चरित्र।

यह उपन्यास दीपांश के जीवन में आने वाली तीन स्त्री पात्रों – हिमानी , शिमोर्ग और रेबेका के आने – जाने की क्रमशः कहानी है। हिमानी पिता के बंधन में रहने वाली लड़की  है; जिससे वह पहली बार प्रेम करता है, शिमोर्ग एक स्वतंत्र लड़की है, और उसके साथ अभिनय करने वाली लड़की है, यह थोड़ा चतुर और जटिल है; रेबेका समाज से छली गई लड़की है; अब वह कालगर्ल है।

चरित्रहीन और चरित्र सुन्दर के अमिट वाक्य को छोड़ दिया जाय तो ‘रेबेका’ ही दीपांश के अधिक करीब है। इन सब में साथी हैं, रमाकान्त, विश्वमोहन, भूपेन्द्र आदि। इसमें अलग तरह के पात्र हैं-सेतिया और मिसेज भसीन और इन सबके साथ है नाटक – ‘डॉमनिक की वापसी’।

दीपांश उत्तराखण्ड का लड़का है, उसके दादा देहरादून में नौकरी करते थे, और उसका परिवार उसी क्षेत्र के किसी गाँव मे रहता था। उत्तराखण्ड बनने के लिए  हुए आन्दोलन और आम आदमी के दमन की प्रक्रिया को भी लेखक ने प्रकट करने की सूक्ष्म कोशिश की है, और पहाड़ो में कैसे अब बाजार आ गया है, और उत्तराखण्ड बनने के बाद आम आदमी अभी भी आम ही है। पहाड़ों के प्रकृति के प्रति लेखक का प्रेम स्पष्ट ही दिखता है। उत्तराखण्ड की तरह ही हिमाचल के मण्डी शहर की प्राकृतिक सुषमा भी हमारा मन मोहती है। इन सब के केन्द्र में दिल्ली है, और दिल्ली का प्रेम, देखे और अनदेख दिल्ली के क्षेत्र बहुत सुन्दर वर्णित हैं।

दीपांश एक अच्छा अभिनेता है, और इस कड़ी में लोग उसे उसी किरदार ‘डॉमनिक’ के नाम से उसे जानते हैं, और यह किरदार उसी तरह भोला है जैसा दीपपांश, और इस भोलेपन में दीपांश के पास सच्चाई है; और यही ऐसी चीज है, जिसकों सभी अपने से दूर करना चाहते हैं।

यह उपन्यास रहस्य रोमांच और सस्पेन्स से भरा हुआ है; नाटक का निर्देशक, फिल्म का निर्माता एक तरह ही होते हैं; नई लड़कियों के साथ बदतमीजी, कैरियर तोड़ने की धमकी  और उनका इस्तेमाल भी इसमें है, दिल्ली में लड़कियों के खरीद फरो़ख्त के गहरे और व्यापक जाल को भी हम इसमें पाते हैं।

इस उपन्यास में प्रभावित करने वाला एक पात्र है, रेबेका का गुरु- ‘अंनत’ इसके चरित्र को जानकर लगता है कि हम-शेखर एक जीवन के ‘बाबा मदन सिंह’ से परिचित हो रहे हैं; इसने समाज की  जेल में रहकर जीवन जीने की कला सीखी  है, और बाबा मदन सिंह ने वास्तव में जेल में रहकर। यह एक अद्भुत चरित्र है, प्रेम में छूटे-टूटे हुए चरित्रों को उजागर करता है।

लोग कहते हैं औरंगजेब के इशारे पर रोशनआरा ने लबगीं को एक ऐसा जहरपिला दिया था जिसके कारण उसकी मौत  हो गई । लबंगी जगन्नाथ से प्रेम करती थी और उसके भाई औरंगजेब के यह पंसद नहीं था। यही कहानी बार-बार समाज में दोहराई जा रही  है, प्रेम के साथ विष की धारण भी एक तरफ से आपके साथ चली आती है इसीलिए यह कहा गया है कि- ‘हर समय में तुम्हें बनाने और मिटाने वाले तुम्हारे साथ – साथ चलते है।’ ( डॉमनिक की वापसी – पृष्ठ – 160)

वास्तव में क्या यह दुनिया बदली है, ’’ दुनिया में तेजी से आए बदलावों की हवा यहाँ भी चली, चीजें बदली। पर ऊपर-ऊपर से……… भीतर से कुछ था जो पहले जैसा ही जड़ था। वही जात-पाँत वही ऊंच-नीच, वही समर्थो की अहम्मन्यता………… अपने ही जाति से बाहर विवाह करने की वजह से कितने ही परिवारों ने तो अपने ही बच्चो को मौत के घाट उतार दिया। उन्हे प्रेम करने की सजा मिली।…….जहां संसार में कितनी मक्कारियाँ फैली हैं और कोई उन्हें रोकने उन पर अंकुश लगाने वाला नहीं, और यहाँ प्रेम की इतनी बड़ी सजा। ’’( डॉमनिक की वापसी – पृष्ठ – 195)  और यह प्रश्न सदियों पुराना है, और उतना ही नित नवीन भी है।

अंत में डॉमनिक (दीपांश) दिल्ली के छल-छद्म भरे महौल को छोड़कर शिवपुरी चला आता है, और रेबेका (रिद्धि) के पिता के संगीत विद्यालय में बच्चों को संगीत सिखाता है; रेबेका अब कहां है, कुछ पता नही, गोवा चली गई या मर गई है, शिवपुरी में ही डॉमनिक को चोट लगती है, और उसे देखने के लिए उसके पहचान के सभी पुराने साथी जुटते हैं. यहीं से कथा शुरू होती है और यहीं आकर  समाप्त. इस बीच डॉमनिक की कला, प्रेम और जीवन की ख़ोज ज़ारी रहती है. इसमें सबसे ज्यादा शिद्दत से तलाश होती है प्रेम की, खोए प्रेम के जीवन में लौट आने की, और इसी प्रेम की वापसी की तलाश में वह पाता है कि अपने लोगों से जुड़कर, उनके लिए कुछ करना ही जीवन की सार्थकता है, उसकी माँ मर चुकी है, पिता हैं नहीं इस कारण वह रेबेका के पिता की छूटी विरासत को सम्हालता है। उपन्यास का पूरा सार इन पक्तियों में है। ‘दरअसल हम सभी में एक साथ ही डॉमनिक, एलिना और उसका पति तीनों रहते हैं। कभी कोई हम पर हावी हो जाता है, कभी कोई। हम कभी डॉमनिक हैं- केवल प्रेम, कभी एलिना-प्रेम को समझते उसकी चाह में भटकते हुए और कभी रॉबर्ट या विश्वजीत की तरह एक व्यापारी- दुनिया के व्यापार में अपना प्रेम भूले हुए।’’ ( डॉमनिक की वापसी – पृष्ठ – 203) ‘डॉमनिक की वापसी’ अर्थात आज के समाज में प्रेम की वापसी करने की सार्थक कोशिश है यह उपन्यास।

\विवके मिश्र का यह उपन्यास अंत तक आते-आते हमारी अन्तर-आत्मा को झकझोर कर रख देता है, और विवश कर देता है सोचने के लिए कि वास्तव में प्रेम करने वालों की समाज में यह गति क्यों है? यही कारण है कि इसे बार–बार पढ़ने का मन करता है, विवके मिश्र को उनके पहले और महत्वपूर्ण उपन्यास ‘डॉमनिक की वापसी’ के लिए बधाई और शुभकामनाओं के साथ…

  • विनोद विश्वकर्मा, सहायक प्राध्यापक
    09424733246
    07415827975

लेखक परिचय: विवेक मिश्र

15 अगस्त 1970 को उत्तर प्रदेश के झांसी शहर में जन्म. तीन कहानी संग्रह- ‘हनियाँ तथा अन्य कहानियाँ’-शिल्पायन, ‘पार उतरना धीरे से’-सामायिक प्रकाशन एवं ‘ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूँ?’- किताबघर प्रकाशन तथा उपन्यास ‘डॉमनिक की वापसी’ किताबघर प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित. ‘Light through a labyrinth’ शीर्षक से कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद राईटर्स वर्कशाप, कोलकाता से तथा पहले संग्रह की कहानियों का बंगला अनुवाद डाना पब्लिकेशन, कोलकाता से तथा बाद के दो संग्रहों की चुनी हुई कहानियों का बंग्ला अनुवाद  भाषालिपि, कोलकाता से प्रकाशित.
लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व कहानियाँ प्रकाशित. कुछ कहानियाँ संपादित संग्रहों व स्नातक स्तर के पाठ्यक्रमों में शामिल. साठ से अधिक वृत्तचित्रों की संकल्पना एवं पटकथा लेखन. चर्चित कहानी ‘थर्टी मिनट्स’ पर ‘30 मिनट्स’ के नाम से फीचर फिल्म बनी जो दिसंबर 2016 में रिलीज़ हुई. दो अन्य कहानियों पर फीचर फिल्में निर्माणाधीन हैं।
कहानी- ‘कारा’ ‘सुर्ननोस-कथादेश पुरुस्कार-2015’ के लिए चुनी गई.
कहानी संग्रह ‘पार उतरना धीरे से’ के लिए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा वर्ष 2015 का ‘यशपाल पुरस्कार’ मिला.
पहले उपन्यास ‘डॉमानिक की वापसी’ को किताबघर प्रकाशन के ‘आर्य स्मृति सम्मान-2015’ के लिए चुना गया.
हिमाचल प्रदेश की संस्था ‘शिखर’ द्वारा ‘शिखर साहित्य सम्मान-2016’ दिया गया तथा ‘हंस’ में प्रकाशित कहानी ‘और गिलहरियाँ बैठ गईं..’ के लिए ‘रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार- 2016’ मिला.
संपर्क- 123-सी, पाकेट-सी, मयूर विहार फेज़-2, दिल्ली-91
मो-9810853128  ईमेल- [email protected]
Show More
Back to top button