क्या कहता है किसानों का यूँ लामबंद होना

वर्तमान में किसानों की लामबंदी, ऐतिहासिकता और निहितार्थ

भारत में किसान प्रतिरोध की परंपरा बड़ी जीवन्त रही है। बंगाल में हुए कैवर्थ विद्रोह से लेकर मुगलिया सल्तनत के विरुद्ध सिक्खों, जाटों और सतनामी कृषकों के असंतोष ने भारतीय मानस पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। ब्रिटिश औनिवेशिक सत्ता की स्थापना के उपरांत उनकी भू राजस्व नीतियों के विरुद्ध बिरसा मुंडा, सिद्धू कान्हु, बाबा रामचन्द्र देव और महात्मा गांधी – पटेल की अगुआई में किसानों ने अपने हक – हकुकी की लड़ाई को आगे बढ़ाया। 1960-70 के दशक में भारत के कुछ क्षेत्रों में कृषि उत्पादन में आई क्रांति ने किसानों को आने वाले दशकों में बाज़ार की शक्तियों के मोहताज कर दिया।

इन्हीं व्यापक सन्दर्भों में तथा हाल में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए कृषि संबंधित कानून के विरोध में किसान बड़ी संख्या में दिल्ली की सीमाओं पर डेरा/घेरा डाल कर अपनी मुहिम को आने वाले दिनों में और विस्तार देने को कटिबद्ध हैं। किसानों ने एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य),परंपरागत मंडियों के अस्तित्व के पक्ष में और ठीका आधारित खेती के विरुद्ध चट्टानी एकता का प्रदर्शन करने में अब तक सफल रहे हैं।

किसानों की इस लामबंदी को भारत के बाहर भी विभिन्न नागरिक समूहों का समर्थन एक असाधारण घटनाक्रम है।वर्तमान किसान आंदोलन की एक और विशेषता यह भी है कि यह अभी तक स्थापित राजनीतिक दलों को अपने मंच से बाहर रखने में भी सफल रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण स्वामीनाथन आयोग की अनुशंसाओं को लेकर उनका दोहरा चरित्र रहा है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि पूंजीवादी कृषि उत्पादन पद्धति को अपनाने के कारण न सिर्फ कृषि उत्पादकता में कमी आई है बल्कि साथ में इसकी लाभ प्रदता भी। केंद्र की मोदी सरकार एमएसपी, मंडियों की व्यवस्था और उसके साथ पीडीएस (जन वितरण प्रणाली) को समाप्त कर लाभार्थियों को सीधे उनके खाते में पैसा भेजना चाहती है । ऐसा कर वह भारतीय कॉरपोरेट /बाज़ार के हवाले कृषि/कृषकों को करना चाहती है और उसके साथ ही पी डी एस के करोड़ों लाभार्थियों को भी।

इसलिए एक आकलन के अनुसार इस आंदोलन के निहितार्थ सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं है बल्कि सरकार द्वारा प्रायोजित कृषि सुधार अधिनियम अगर कार्यान्वित हो गए तो भारत के वंचित सामाजिक समूहों की दुश्वारियां और बढ़ेंगी और ग्रामीण भारत सुलगता नजर आयेगा।

उपरोक्त विवेचना से स्पष्ट है कि किसानों की दिल्ली में घेराबंदी की चिंताएं वर्गीय सीमाओं को लांघते हुए संविधान वर्णित कल्याणकारी राज्य की मान्यताओं के संरक्षण की ओर हमारा ध्यान खींचता है और सक्रिय सहभागिता की अपेक्षा भी।

 

2007 और 2020 के किसान बिल मसौदे में यह फर्क है

किसानों का दिल्ली और सरकार का हैदराबाद कूच

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Dr. Narendra Pandey

डॉ. नरेंद्र कुमार पांडेय, एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास विभाग, राम लाल आनंद कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय। एम ए, हंसराज कॉलेज, दिल्ली और डॉक्टरेट, जे आर एफ (यू जी सी) के साथ।

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