कोरोना वायरस, लॉक डाउन और मज़दूरों की त्रासदी

Story Highlights
  • कोरोना वायरस ने इस साल ही नहीं बल्किआने वाले कई सालों तक के लिए दुनिया में बहुत कुछ बदल दिया है
  • कोरोना वायरस से लड़ाई में लॉकडाउन दुनिया में एक अच्छा हथियार बनकर उभरा, पर इसके साथ-साथ यह गरीबों खासतौर पर मज़दूरों के लिए कहर भी बना
  • भारतीय मजदूरों की जो दुर्दशा इस बीमारी के कारण हुई है, उस पर मीडिया हाउसेस ने बहुत कम स्टोरी कवर की है
  • मज़दूरों का पलायन, दुर्दशा और दर्दनाक मौत ने कोरोना की त्रासदी को कई गुना बढ़ा दिया

साल 2020 मानवता के इततहास में हमेशा याद रखा जाएगा। कोरोना वायरस के द्वारा फैलने वाली बीमारी Covid19 के कारण इस साल बहुत कुछ बदल गया। बल्कि कोरोना वायरस ने आने वाले कई सालों तक के लिए बहुत कुछ बदल दिया है। इस वायरस के कारण शुरू हुई वैश्विक महामारी के मद्देनजर हर देश ने इससे लड़ने के लिए कई कदम उठाए जिसमें लॉकडाउन या फिर तालाबंदी एक अच्छा हथियार बनकर उभरा। पर इस हथियार के जो साइड इफ़ेक्ट्स हमारे देश पर हुये वैसे किसी और देश मे नहीं देखे गए। लाखों की तादाद में मजदूरों का पलायन शुरू हुआ जो बदस्तूर जारी है।

कोरोना वाइरस कैसे फैला, उसके ताज़ा आंकड़े आप तक लगातार मीडिया द्वारा पहुंचाए जा रहे हैं। इस बीमारी से लड़ने में विश्व भर के चिकिस्ता विशेषज्ञ तथा पुलिस का योगदान भी पूरे विश्व में देखा और सराहा जा रहा है। पर भारतीय मजदूरों की जो दुर्दशा इस बीमारी के कारण हुई है, उस पर मीडिया हाउसेस ने बहुत कम स्टोरी कवर की है। भारत में 22 मार्च को हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी ने जनता कर्फ्यू लागू किया। जनता कर्फ्यू लागू करने से 31 मार्च तक ही कुल 34 मजदूर अलग अलग घटनाओं में मारे जा चुके थे और यह आंकड़ा अब तक महाराष्ट्र में रेलवे लाइन पर हुये हादसे मे हुई 16 मौतों के साथ 18 मई तक कुल 423 मजदूरों की मौत को छू चुका है।

इसी लॉकडाउन में भारत सरकार मे रेलमंत्री पीयूष गोयल दावा करते पाये जाते हैं कि 3 महीने मे कोई भूखा नहीं सोया। शायद मंत्री जी को रोड पर चलते मजदूर और जगह जगह उन्हें खाना और पानी उपलब्ध कराने का प्रयास करते आम नागरिक नहीं दिखाई दिए। किसी ने मंत्री जी तक एक भूखे द्वारा भूख मिटाने को मरा हुआ जानवर खाने की खबर नहीं पहुंचाई शायद। मंत्री जी यह दावा ऐसे समय करते हैं जब बच्चों द्वारा भूख मिटाने को पेड़ की सूखी पत्तियां खाये जाने की शर्मनाक खबर तक आती है। प्रधानमंत्री जी को उन्हें समझाना चाहिए कि जिस वक़्त सारा देश एक आपदा से गुज़र रहा है उस वक़्त अपनी पीठ थपथपाना शायद एक अच्छा विचार नहीं है। रेलमंत्री का यह बयान तब और ज़्यादा शर्मनाक बन जाता है जब उन्हीं की पाटी के एक मुख्यमंत्री एक अन्य दल को मजदूरों को ले जाने के लिए बसें चलाने की अनुमति केवल इसलिए नहीं देते क्योंकि उपलब्ध कराई गयी बसों की सूची में कुछ बसों के फिटनेस सर्टिफिकेट वैध नहीं थे। इसी लॉकडाउन में दिल्ली सरकार रोजाना 10 लाख भूखों को खाना खिलाने के लिए खाना बनवा रही थी पर उसकी तारीफ नहीं की गई, केरल अपने दम पर कोरोना का फैलाव रोकने में कामयाब हो रहा है पर मंत्री जी उसके प्रयासों को नहीं सराहते।

लॉकडाउन लागू करने की मंशा चाहे जितनी ही अच्छी रही हो पर बिना तैयारी के किया गए अचानक किये गए लॉकडाउन का एक स्याह पहलू मजदूरों की मौतें भी हैं। यदि सही समय पर तैयारी के साथ फैसला लिया गया होता तो आज शायद मजदूरों की यह दुर्दशा नहीं हुई होती।

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Zuhaib Khan

सोशल इशूज़ पर लिखना पसंद है, मुरादाबाद में रहते हैं और स्नातक तक पढ़ाई की है

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