भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोरोना वायरस की तगड़ी मार

कोरोना महामारी ने वापस देश की चलती आर्थिक गाड़ी को पटरी से उतार दिया है। भारत सरकार वापस चिंता में पड़ गयी है की आखिर ये स्थिति फिर से कैसे काबू में की जाएगी।

भारत में कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों के चलते हमारा न सिर्फ स्वास्थ विभाग प्रभावित हुआ है बल्कि देश पर आर्थिक संकट के बादल मंडरा रहे है। विश्व बैंक और रेटिंग एजेंसी ने वित्त वर्ष 2021 के शुरू में ही पूर्वानुमान लगाया नो की 1990 के बाद पिछले 3 दशकों में लगाया गया सबसे कम अनुमान है। रिपोर्ट के मुताबिक ये महामारी ऐसे समय में आई है। जब भारतीय अर्थव्यवस्था पहले से ही सुस्त पड़ी है और कोरोना महामारी के बाद इस पर दबाव और अधिक गया है।

पिछले साल मई 2020 में आर्थिक पैकेज की घोषणा के बाद भारत का साल घरेलु उत्पाद तो नकारात्मक आंकड़ों से और भी नीचे चला गया। जो एक गहरे आर्थिक संकट का संकेत था। 22.03.2020 में कोरोना के मामलों को संख्या 500 तक पहुंच गई थी और इसके चलते 24.03.2020 को कम्पलीट लॉक डाउन लगा दिया गया जिसके कारन कई सरकारी व्यवसाय और उद्योग प्रभावित हुए घरेलु आपूर्ति और मांग प्रभावित होने के चलते आर्थिक वृद्धि दर प्रभावित हुई है। विश्व बैंक के अनुसार केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरा दक्षिण एशिया गरीब उन्मूलन से मिले फायदों को गवा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ ने कहा है की कोरोना वायरस सिर्फ एक स्वस्थ संकट नहीं रहा बल्कि एक बहुत बड़ा लेबर मार्किट और आर्थिक संकट बन गया है जो लोगो को बड़े पैमाने पर प्रभावित करेगा ! लॉक डाउन का सबसे ज्यादा असर अनौपचारिक क्षेत्र में देखने को मिला है और हमारी जीडीपि का 50 % इसी क्षेत्र से आता है कोरोना वायरस भारत में बहुत तेज़ी से फ़ैल रहा है।

जिसकी वजह से रोज़ कई मौते हो रही है कई मजदूर पलायन कर गए कई की मृत्यु हो गई जिसके कारन रोज़गार ओके बड़ा नुक्सान हुआ है अर्थशास्त्रिओं के अनुसार मुद्रास्फीति में वृद्धि हुई है जिसका मतलब है की सुधार जल्दी नहीं हो सकता ध्यान देने वाली बात ये है की पिछले साल 2020 में लॉक डाउन के कारन 14 करोड़ लोगों ने अपना रोज़गार खो दिया जबकि अन्य लोगों की सैलरी में कटौती हुई थी और अगर 2021 में पहले वर्ष 2020 की तुलना की जाये तो 45% परिवारों ने अपनी आय में गिरावट दर्ज़ की है इस महामारी से माध्यम वर्ग और अन्य वर्ग तो प्रभावित हुआ ही है पर जिस पर इसकी सबसे ज्यादा मर पड़ी है वह है कर्मचारी और मजदूर वर्ग वही अगर किसानो की बात करे तो उनका हाल भी बद से बदतर हो गया है !

वही फिच ने भारत को बी बी बी रेटिंग दी है और कहा है की सकल घरेलु उत्पाद में सुधार होने में देरी हो सकती है पर इस वजह से अर्थव्यवस्था का पहिया पटरी से उतरेगा नहीं जो थोड़ा रहत भरा प्रतीत होता है पर क़र्ज़ वृद्धि को लेकर लम्बे समय तक अनिश्चितता की और भी ये रिपोर्ट इशारा करती है और कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों के चलते वित्त वर्ष 2021-22 में भी इसमें खास सुधार की कोई सम्भावना नहीं है! संभवत: संक्रमण के मामलों में गिरावट आये तभी कुछ सकारात्मक सम्भावनाये नज़र आएँगी !

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