अम्बेडकर और गांधी: एक ही सिक्के के दो पहलू!

हाल के वर्षों तक इतिहास लेखन की मुख्य धारा में अम्बेडकर और गांधी को परस्पर विरोधी चिंतक/विचारक के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश रही है। विशेष रूप से वर्ण,जाति, लिंग,पश्चिमी संस्कृति,पूंजीवाद,आदि प्रश्नों पर।

परन्त हाल के वर्षों में हुए इतिहास लेखन ने इस तथ्य को आंशिक सत्य बताते हुए इस वास्तविकता को रेखांकित करने की चेष्टा की है कि गांधी और अम्बेडकर दोनों एक ऐसे समाज के पुनर्निर्माण के लिए कृत्संकल्पित थे जो न्याय, नैतिकता और बंधुत्व के मूल्यों से सिंचित हो।भारत के स्वाधीनता आंदोलन में एक साथ कई धाराएं सक्रिय थीं।यह आंदोलन किसी एक व्यक्ति या वैचारिकी के पूर्ण वर्चस्व में नहीं रहा।

गांधी, अम्बेडकर,भगत सिंह, सुभाष बोस,आदि अवश्य  राष्ट्रीय फलक पर महानायक के रूप में उभरे;लेकिन भविष्य का भारत कैसा हो इस संदर्भ में उनकी दृष्टि में एकरूपता नहीं थी। हां,एक धारा को छोड़ कर जो भारत की आज़ादी में कभी गंभीर अर्थों में सम्मिलित नहीं हुआ और आज सत्ता के शीर्ष पर काबिज है, शेष धाराएं अपनी राजनीति के साध्य के रूप में एक समता मूलक सामाजिक संरचना की स्थापना चाहती थीं। इसमें कोई संदेह नहीं कि वर्ण, जाति, राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों और पश्चिमी मान्यताओं पर आधारित शिक्षा व्यवस्था को लेकर अम्बेडकर और गांधी के विचार भिन्न थे और पूना समझौता के घटनाक्रम ने इसको गंभीर रूप से रेखांकित/प्रचारित होने दिया है।

परंतु अम्बेडकर और गांधी के मध्य विभिन्न प्रश्नों पर मत भिन्नता को तात्कालिक राजनीतिक सन्दर्भो और व्यक्तित्वों की अहम टकराहट से अलग सामाजिक रूपांतरण/परिवर्तन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझने की आज आवश्यकता है। विशेष रूप से तब जब सामाजिक मुक्ति की परियोजना और बहुतेरे जन संघर्ष  की समृद्ध विरासत नव पूंजीवादी वैचारिकी /उपकरणों के सामने दम तोड़ रही हैं। अम्बेडकर और गांधी दोनों पूंजीवाद के आलोचक थे।

परन्तु उनकी आलोचना अपनी मान्यताओं पर आधारित थीं।वे दोनों धन के अतिशय केन्द्रण के विरोधी थे। अंबेडकर अवश्य शहर/शहरीकरण की प्रक्रिया में जाति व्यवस्था की संरचना में व्याप्त हिंसा,तिरस्कार और अन्याय से फ़ौरी राहत की संभावना देखते थे।

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में गांधी स्वयं जाति व्यवस्था के उन्मूलन के तर्क से सहमत होते दिख रहे थे। परंपराओं को लेकर भी गांधी और अम्बेडकर दोनों आलोचनात्मक दृष्टि रखते थे।गांधी जहां परंपराओं का रचनात्मक इस्तेमाल कर राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई धार और दिशा दी,वहीं अम्बेडकर परंपराओं के केचुए में ब्राह्मणवादी सामाजिक बनावट की आत्मा को देखते थे। परन्तु यह भी सत्य है उनकी धम्म की संकल्पना भी भारत की पारंपरिक संपदा का ही एक हिस्सा थी।

संक्षेप में उपरोक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि गांधी और अम्बेडकर नीत विमर्श का रचनात्मक विश्लेषण इस तथ्य की पुष्टि करता है कि तात्कालिक राजनीतिक सन्दर्भो/परिस्थितियों के कारण अम्बेडकर और गांधी दो विषम ध्रुवों पर खड़े दिखाई पड़ते हैं,परन्तु दोनों में  एक ऐसे समाज के निर्माण की छटपटाहट थी जहां हर एक व्यक्ति अपने को संप्रभु समाज सके और बिना किसी सामाजिक /सांस्कृतिक भेदभाव के अपनी नैसर्गिक संभावनाओं को मूर्त रूप प्रदान कर सके।

 

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Dr. Narendra Pandey

डॉ. नरेंद्र कुमार पांडेय, एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास विभाग, राम लाल आनंद कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय। एम ए, हंसराज कॉलेज, दिल्ली और डॉक्टरेट, जे आर एफ (यू जी सी) के साथ।

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